Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

एक नीली सी नदी..

बरसों के अंतराल में, उस समय तुम बिना किसी रोक-टोक के प्रेम में डूबे थे, और मैं भी उसी प्रेम में भीग रही थी। तुम्हें नीला रंग पसंद था, और मैं नीलम की तरह दमक रही थी। हमारे शब्द एक मधुर लय में बह रहे थे, जैसे दो प्रेमी अपने सपनों के गीत गा रहे हों। मैं प्रेम की नदी बनी थी, और तुम, पुरुष, बांध बनाने के लिए पत्थर चुनने लगे। हमारे गीत उन पत्थरों से टकरा कर शब्द बनाते रहे, फिर धीरे-धीरे बिखर गए। तुम लगातार बरसते रहे, और मैं सूख गई।
सुनो पुरुष, प्रेम के घर बांधों से नहीं बनते, ये बहती नदी के नावों पर बनते हैं। व्यस्त हाथों के बावजूद, उस सूखी जमीन के भीतर अब भी एक नीली-सी नदी बह रही है। क्योंकि प्रेम में खो जाना भी प्रेम में होना ही माना जाता है।

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लकीरों और दायरों के पार

लकीरों और दायरों ने हमें अलग करने की कोशिश की, पर हर दूरी में तुम और अधिक मेरी ओर सिमट आईं। जिन दीवारों ने हमें रोका था, वे धीरे-धीरे ढहने लगीं। तुम, जो किसी सैलाब की अमानत थीं, अब अपने भीतर की उफान को थामकर शांत बहने लगीं। और जब होंठों ने चुप्पी साध ली, तब निगाहों ने वह सब कह दिया जो शब्दों में बयाँ न हो सका।

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