
शारदा कनोरिया शुभा, प्रसिद्ध लेखिका, पुणे (महाराष्ट्र)
नवरात्रि का आगमन मानो जीवन में एक मधुर ज्योति का संचार कर देता है।
चारों ओर फैली पवित्रता, वातावरण में गूंजते मंत्र, दीपों की थरथराती लौ और मन में उठती भक्ति की लहर—यह सब मिलकर ऐसा लगता है जैसे आत्मा किसी अदृश्य शक्ति से आलिंगन कर रही हो।
मेरे लिए नवरात्रि केवल पूजा-अर्चना का समय नहीं, यह आत्मा से संवाद का अवसर है।
जब मैं माँ के नौ स्वरूपों का स्मरण करती हूँ, तो वे किसी पुराण-कथा की दूरस्थ प्रतिमाएँ नहीं लगते, बल्कि जीवन के हर मोड़ पर मेरे सहचर बनकर खड़े हो जाते हैं।
शैलपुत्री का धैर्य मुझे सिखाता है कि हर शुरुआत दृढ़ता से होनी चाहिए।
चंद्रघंटा का सौम्य स्वर कहता है कि जीवन की गूँज करुणा से भरी हो।
कात्यायनी का साहस याद दिलाता है कि अन्याय के सामने मौन नहीं, संकल्प होना चाहिए।
और सिद्धिदात्री का आशीर्वाद… वह तो हर कठिनाई को वरदान में बदलने की कला है।
मेरे लिए नवरात्रि उपवास नहीं, उप-वास है…
माँ के और अधिक समीप बैठने का अवसर।
उनकी उपस्थिति मेरे भीतर ऐसी शांति भर देती है, मानो सारे भय, संदेह और बोझ उनके चरणों में विलीन हो गए हों।
कभी मंदिर की आरती में,
कभी दीपों की टिमटिमाती लौ में,
तो कभी कन्याओं की हँसी में
मुझे माँ का साक्षात आशीष दिखाई देता है।
उस क्षण लगता है कि माँ दूर नहीं, वे मेरे चारों ओर, और सबसे बढ़कर मेरे भीतर ही हैं।
नवरात्रि मुझे यही स्मरण कराती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका आत्मविश्वास है।
अंधकार को केवल आस्था का दीप मिटा सकता है।
और रिश्तों की सच्ची नींव केवल अपनापन है।
मेरे लिए नवरात्रि का अर्थ है—
अपने भीतर की सुप्त शक्ति को पहचानना,
हर हार में छिपी सीख को अपनाना,
और हर कठिनाई में छिपे वरदान को देखना।
इसलिए नवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है—
भीतर से बाहर तक,
भक्ति से शक्ति तक,
और शक्ति से जीवन की विजय तक।

बहुत सुन्दर प्रस्तुति
ईश्वर आपकी लेखन गुणवत्ता में उत्तरोत्तर वृद्धि करें। औऊम नमो नारायण ॐ
धन्यवाद 🌹🙏