सतुआनी पर्व
सतुआनी पर्व पर आधारित यह कविता नई फसल की खुशियाँ, सत्तू के महत्व और भारतीय परंपरा की सुंदर झलक प्रस्तुत करती है। यह पर्व प्रकृति, स्वास्थ्य और संस्कृति का अद्भुत संगम है।

सतुआनी पर्व पर आधारित यह कविता नई फसल की खुशियाँ, सत्तू के महत्व और भारतीय परंपरा की सुंदर झलक प्रस्तुत करती है। यह पर्व प्रकृति, स्वास्थ्य और संस्कृति का अद्भुत संगम है।
यह लेख भारत की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता की महत्ता को उजागर करता है और आधुनिक युग में इसके ह्रास और सामाजिक बदलावों का चिंतन प्रस्तुत करता है। पारंपरिक रीति-रिवाजों, आदर्श जीवन शैली और सांस्कृतिक मूल्यों की तुलना आज के बदलते समय से की गई है।
आलमारी खोली तो कपड़े बहुत थे, पर एक भी प्रेस किया हुआ नहीं। कपड़ों का ढेर देखते ही बाबूजी याद आ गए जब साल में बस दो बार नए कपड़े सिलते थे। बसंती दा से उधारी में कपड़ा लेना, टेलर की दुकानों के चक्कर, “थोड़ो लंबो-जंबो सिलजो, बच्चा बढ़ रहा है” की आवाज़, और नए कपड़ों के इंतज़ार का उत्साह… आज भले मॉल में पहनकर घर आ जाएं, पर वो इंतज़ार, वो खुशी, अब कहीं नहीं मिलती।
बस से मसूरी की यात्रा पर निकली साक्षी अपने परिवार के साथ मंदिर पहुँचती है। जैसे ही वह मंदिर के अहाते में कदम रखती है, एक बूढ़ा व्यक्ति उसे देखकर दौड़ा चला आता है और कहता है — “बिटिया, तू आ गई! मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था।”
सब हैरान रह जाते हैं। बूढ़ा एक पुरानी तस्वीर दिखाता है . उसमें साक्षी जैसी ही एक लड़की थी, नाम लिखा था “नूरी”। बूढ़े की आँखों में आँसू हैं, और साक्षी के मन में एक अनजाना कंपन।
क्या यह महज़ संयोग है, या सचमुच किसी पुनर्जन्म की कहानी शुरू हो चुकी है?
नवरात्रि और दुर्गा पूजा केवल देवी की मूर्तियों की आराधना तक सीमित नहीं हैं। यदि समाज में नारी असुरक्षित है, तो देवी पूजन का वास्तविक भाव अधूरा रह जाता है। नारी सिर्फ पूजा का विषय नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकारों की अधिकारी है। उसे सुरक्षा, स्वतंत्रता और समानता मिलती है, तभी देवी की शक्ति, ज्ञान और ममता का प्रतीक सजीव होता है। भारतीय परंपरा में नारी को ‘शक्ति’ कहा गया है, और वही शक्ति घर और समाज की आधारशिला है। मंदिर में दीप जलाना आसान है, पर हर घर, गली और कार्यस्थल पर नारी को सुरक्षित और स्वतंत्र बनाना ही सच्ची भक्ति है। नवरात्रि हमें यही प्रेरणा देती है कि नारी को देवी मानने का अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि उसके जीवन को सम्मानजनक और सुरक्षित बनाना है।
“नवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है। यह हमें हमारे भीतर की सुप्त शक्ति को पहचानने, हर कठिनाई में छिपे वरदान को देखने और आत्मविश्वास से अंधकार को मिटाने की प्रेरणा देता है।”
ज्योति सोनी “वैदेही ” अलवर ,राजस्थान दीपावली, अंधेरे रूपी शत्रु के विरोध में सैकड़ों दियों की क्रांति का त्यौहार है। किस तरह नन्हे-नन्हे दिए, अपने साहस को समेटकर पूरी शक्ति और हिम्मत से उस अंधेरे को चीरते हुए धीरे-धीरे जलते हैं, जिसने उन्हें चारों ओर से घेर रखा है। उस कमजोर सी बाती में कितनी…
“नवरात्रि का महत्त्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, आत्मबल और मानवीय जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाला पर्व है। नौ रातों तक माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना से भक्त अपने जीवन में शक्ति, साहस, ज्ञान और भक्ति का विकास करते हैं। उपवास और संयम शरीर को शुद्ध करते हैं, जबकि ध्यान, पूजा और मंत्रजप मन और आत्मा को पवित्र बनाते हैं।
यह पर्व हमें यह शिक्षा देता है कि सत्य और धर्म की विजय निश्चित है, जबकि असत्य और अधर्म का अंत होना अवश्यंभावी है। नवरात्रि का सांस्कृतिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है—देशभर में गरबा, डांडिया और रामलीला जैसे उत्सव समाज में उत्साह, एकता और सहयोग की भावना जगाते हैं। साथ ही, यह पर्व स्त्री-शक्ति के आदर और सम्मान का प्रतीक है, जो हमें याद दिलाता है कि नारी केवल स्नेह और ममता की मूर्ति नहीं, बल्कि संकटों का सामना करने वाली साहस और संकल्प की प्रतिमूर्ति भी है।
मुरलीधर की मुरली हमें यही सिखाती है कि जीवन में प्रेम-भक्ति में मगन रहो। हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि हमने किस हेतु जन्म लिया और अपने विचारों को पावन बनाए रखना चाहिए। जीवन की यह कर्मभूमि सत्कर्मों के लिए है, और हमें चर और अचर दोनों का ध्यान रखना चाहिए। धन-दौलत तो आनी-जानी है, लेकिन सत्य को मानकर मगन रहना आवश्यक है।
संयम और धीरज बनाए रखना चाहिए, धर्म की बातों में निष्पक्ष होना चाहिए। जीवन के संघर्षों में आगे बढ़ते हुए सुंदर मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। अपने आत्म-विवेचन से दृढ़ प्रतिज्ञ बनो और हमेशा मगन रहो।
विद्या सबसे बड़ा धन है, और जीवन में सम्मत व्यवहार करना चाहिए। संयम और अदम्य साहस से अपने संघर्षों का समाधान करना चाहिए और संस्कृति के सहोदर बनकर जीवन जीना चाहिए।
नारी केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्र के निर्माण में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्राचीन काल से ही सीता, गार्गी, सावित्री और अपाला जैसी नारियों ने अपनी बुद्धिमत्ता और साहस से समाज को नई दिशा दी। मध्यकाल में रानी लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई होल्कर और बेगम हजरत महल जैसी वीरांगनाओं ने अपने साहस से यह सिद्ध किया कि नारी किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं।
आधुनिक युग में भी नारी ने हर क्षेत्र—विज्ञान, राजनीति, कला, खेल और व्यापार—में सफलता के झंडे गाड़े हैं। कल्पना चावला, किरण बेदी, सुनीता विलियम्स और मैरी कॉम जैसी प्रेरणादायी महिलाएँ इसका प्रमाण हैं।