भारतीय संस्कृति और सभ्यता का बढ़ता संहार

Traditional Indian family scene showing elders blessing children, a cow in the courtyard, books and scriptures on wooden shelves, colorful decorations, and family members in traditional attire performing cultural rituals, representing the richness of Indian culture and heritage.

डॉ. प्रेरणा बुडाकोटी, नई दिल्ली

दुनिया भर में अपनी संस्कृति और सभ्यता के लिए भारत देश प्राचीन युग से लेकर आधुनिक युग तक प्रसिद्ध रहा है। विभिन्न राज्यों, धर्म, वेद पुराणों, संगीत, कला, साहित्य, भाषा, बोली एवं खान-पान इत्यादि होने के बावजूद भी भारत देश एकता का समूह है, जो लोगों को आकर्षित करता है। व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक अनगिनत रस्म-रिवाज भारतीय व्यक्ति को अपनी एक अलग पहचान और विरासत को दर्शाते हैं। संस्कृति और सभ्यता एक बहुमूल्य धरोहर है, जिसका मूल्य आधुनिक जमाने में विलुप्त होता जा रहा है। भारत देश के नागरिक दूसरे देश की सभ्यता को बिना समझे और अज्ञानता की राह पर चलकर अपनी देश की संस्कृति का उपहास और उल्लंघन कर रहे हैं।

  • जिन कार्यों को व्यक्ति पहले अपने जीवन के बहुमूल्य कार्यों में से चयनित करके करता था, आज सोशल मीडिया पर खुद को अच्छा दिखाने के लिए और अपनी पोस्ट को अन्य लोगों द्वारा भी कीमती प्रोत्साहन वाली तालियों को जोड़ने के लिए करता है।
  • पहले माता-पिता का सत्कार उनके साथ समय बिताना जीवन का हिस्सा था, परंतु आज किसी खास अफसर पर ही जैसे कि मदर डे और फादर डे पर माता-पिता को फोटो क्लिक करने के लिए याद किया जाता है और सोशल मीडिया पर पोस्ट किया जाता है।
  • पहले बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद ईश्वर के आशीर्वाद समान होता था, परंतु अब बड़े बुजुर्गों को याद करने के लिए भी सीनियर सिटिजन डे जैसे दिन का आयोजन किया जाता है। बाकी अन्य दिन बड़े बुजुर्गों द्वारा दी गई सलाह को पुरानी पीढ़ी का टैग दिया जाता है।
  • पहले घरों और दुकानों में चप्पल-जूते को बेचते और रखते समय फुटपाथ या सड़क किनारे दरी पर रखा जाता था, परंतु आज चप्पल-जूता पहनकर घर में प्रवेश करना बहुत ही सामान्य हो गया है और बाजार में कांच की अलमारी पर सजाकर जूते-चप्पलों को बेचा जा रहा है।
  • पहले घर के आंगन में गौ माता का वास होता था या फिर गौ माता को प्रतिदिन पूजा जाता था, परंतु अब यह रस्म-रिवाज लुप्त हो गए हैं। अब गाय की जगह कुत्ते, बिल्लियों और अन्य जीव-जंतुओं/पशुओं को घर के बिस्तर पर साथ में रखने की प्रथा प्रचलित हो गई है। ज्यादातर गाय अब सड़कों पर देखी जाती है।
  • पहले किताबों को शिक्षा का ईश्वर माना जाता था, ज्यादातर लोग पुस्तक या विद्या के नाम से बुलाते थे। पुस्तकालय में खजाने के रूप में किताबों को रखा जाता था। परंतु आज बहुत अफसोस होता है जब सड़क किनारे फुटपाथ पर प्लास्टिक की गंदी पॉलिथीन के ऊपर किताबों का ढेर बेचने के लिए रखा जाता है।
  • पहले नृत्य कला, संगीत कला को प्रार्थना या फिर कला-संस्कृति के रूप में प्रस्तुत किया जाता था, परंतु आज संगीत और नृत्य की परिभाषा को अश्लीलता में बदल दिया गया है।
  • पहले विवाह शादियों में सात वचनों को मान-सम्मान देकर जीवनसाथी के साथ जिंदगी बिताने की कसम खाई जाती थी, परंतु आज समाज में सिपरेशन और डायवोर्स जैसे नियमों का पालन अधिक किया जा रहा है।
  • पहले कन्या और महिलाओं को बहन, बेटी और मां के रूप में देखा जाता था, परंतु आज अपनी ही बहन-बेटियों के साथ दुष्कर्म किया जा रहा है।
  • पहले गुरु द्वारा दी गई ज्ञान और सलाह को लक्ष्मण रेखा माना जाता था, परंतु अब गुरु को ही पैसों के साथ तोला जा रहा है।
  • पहले व्यक्ति अपने लिए स्वस्थ जीवन शैली अपनाता था, क्योंकि पहले उसे खुद से प्यार था। समय पर उठना, समय पर सोना, सेहत का खास ख्याल रखना और स्वच्छ और स्वस्थ भरपूर भोजन करना ही उसकी प्राथमिकता थी। परंतु अब नए जमाने की उपकरणों को गलत तरीके से अपनाकर व्यक्ति अपना ही जानलेवा हत्यारा बन गया है।
  • पहले शरीर की सुंदरता बढ़ाने के लिए शानदार ढंग से कपड़े पहने जाते थे, परंतु अब शरीर को दिखाने के लिए व्यक्ति खुद को निर्वस्त्र कर रहा है।
  • पहले भारत देश का व्यक्ति कहीं भी जाए, तो अपनी मिठास, बोली और संस्कारों से अपने देश एवं अपना परिचय देता था, परंतु अब अपने ही देश में रहकर व्यक्ति अपनी सभ्यता को भूलकर अन्य देश की सभ्यता को अपना रहा है।
  • आज के युग में व्यक्ति को अपनी सभ्यता याद दिलाने के लिए पुरानी सभ्यता में नयापन करके अनुभवी लोगों को प्रस्तुत करना पड़ता है, ताकि आने वाली पीढ़ी उन चीज़ों पर आकर्षित हो। अन्यथा गौरवशील भारत की संस्कृति और सभ्यता का अज्ञानी लोग विनाश करते जा रहे हैं।

महत्वपूर्ण: अपनी संस्कृति और सभ्यता को प्रस्तुत करना किसी भी व्यक्ति के लिए सर झुकाने के समान नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के जन्म का प्रमाण है। आज की नवयुवा और आने वाली नई पीढ़ी के लिए अपनी भाषा और अपने नियमों का उल्लंघन अपने जीवन के साथ एक दंडनीय अपराध के समान है।

One thought on “भारतीय संस्कृति और सभ्यता का बढ़ता संहार

  1. संस्कार संस्कृति और सभ्यता की त्रिवेणी बहुत खूब

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