न सावन की चिट्ठी
न बारिश के संदेश।
भूल गए क्या लिखना
मेरे गाँव का पता..?
कुंडी खटका कर यूँ
बैरंग ही लौटे जा रहे
ये आसमानी लिफ़ाफ़े,
जिन पर मेरे पते की बजाय
“देवभूमि” लिखा था।
कालिदास के
मेघदूत से ये
विचरते रहे वही
अश्रु-वैग लिए,
जहाँ संदेश देकर
फट पड़े वज्र-से।
और यहाँ के आँगन
कपासी बादलों की
उमस झेल रहे।
ये खपरैल बैठे
अभी तक सर मुंडाने,
और पेड़ों से झर रहे
पात पीले-पीले।

कृष्णा तिवारी, प्रसिद्ध लेखिका, नागदा जंक्शन (मध्यप्रदेश)