सबके हृदय को भाया सावन

सावन का महीना आते ही प्रकृति खिल उठी है। बादल रिमझिम बरस रहे हैं और मोर अपने पंख फैलाकर नाच रहे हैं। बिजली की चमक आकाश को दमका देती है। बच्चे हर्षित हैं, क्योंकि सावन का मौसम लौट आया है। घर-घर में पूड़ी, कचौड़ी और पकोड़ी बन रही हैं, चटनी के साथ इनका स्वाद और बढ़ जाता है। झरनों पर सैर-सपाटा करने का आनंद है और सब मिलकर झूमते-नाचते हैं।
खेतों में फसलें लहराकर हरियाली फैला रही हैं, फूलों की बहार मन को मोह लेती है। नीम और बरगद पर झूले पड़ गए हैं, जिन पर बच्चे और बड़े सभी झूलते हुए खुशी से भर उठते हैं। मिट्टी की भीनी-भीनी महक और पक्षियों की मधुर चहचहाहट वातावरण को और सुहाना बना देती है। प्रकृति का यह रूप सचमुच मनभावन है और हर दिल को भा जाता है।

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इस बार मैं चुप रहूंगी

उस दिन एक स्पर्श हवा में ठहर-सा गया था, ठीक उसी क्षण जब शब्दों ने जन्म लेना ही चाहा था। तुम्हारी बात सिर्फ मेरे कानों तक नहीं पहुँची, वह सीधे भीतर तक उतर आई थी। मगर भाषा की गलियाँ उन दिनों बहुत संकरी थीं। खिड़की आधी ही खुली थी और बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—न थमने का, न बरसने का।

स्मृति आज भी वहीं अटकी है, जहाँ तुमने मुझे बिना कुछ कहे देखा था। उस शाम समय बहुत तेज़ी से गुज़र गया था, या शायद वह ऊबकर किनारे खड़ा रह गया था। मुझे लगा था कि तुम कुछ कहना चाहते हो, और मैं अपनी घबराहट में, कुछ न कहकर भी सब कुछ कह चुकी थी। अब अगर तुम फिर से मिलो, तो मैं इस बार चुप रहूँगी। कुछ नहीं कहूँगी—बस तुम्हें लिख दूँगी। और अगर हो सके, तो तुम बस पढ़ लेना।

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अधूरी बारिश की दास्तान

गाँव का पता ही भूल गया हो। बादल चिट्ठियों की तरह आते हैं, लेकिन बिना संदेश दिए लौट जाते हैं। जिन पर “देवभूमि” लिखा होता है, वहाँ तो मेघदूत की तरह वे आँसू और वज्र के साथ बरसते हैं, पर यहाँ आँगन उमस और प्रतीक्षा में सूखा पड़ा है। खपरैल की छतें अब भी बारिश का पानी सोखने को तैयार बैठी हैं, और पेड़ों से पत्ते पीले होकर झरते जा रहे हैं। इस चित्रण में वर्षा की अनुपस्थिति केवल मौसम का अभाव नहीं है, बल्कि एक गहरी भावनात्मक कमी और विरह का प्रतीक बन जाती है।

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