मेघा, अब तो आओ
सूखी धरती मेघों को पुकार रही है. प्यासे खेत, तड़पते किसान और तपन से झुलसी दुनिया बादलों से जीवन-वर्षा की विनती करती हुई।

सूखी धरती मेघों को पुकार रही है. प्यासे खेत, तड़पते किसान और तपन से झुलसी दुनिया बादलों से जीवन-वर्षा की विनती करती हुई।
सावन का महीना आते ही प्रकृति खिल उठी है। बादल रिमझिम बरस रहे हैं और मोर अपने पंख फैलाकर नाच रहे हैं। बिजली की चमक आकाश को दमका देती है। बच्चे हर्षित हैं, क्योंकि सावन का मौसम लौट आया है। घर-घर में पूड़ी, कचौड़ी और पकोड़ी बन रही हैं, चटनी के साथ इनका स्वाद और बढ़ जाता है। झरनों पर सैर-सपाटा करने का आनंद है और सब मिलकर झूमते-नाचते हैं।
खेतों में फसलें लहराकर हरियाली फैला रही हैं, फूलों की बहार मन को मोह लेती है। नीम और बरगद पर झूले पड़ गए हैं, जिन पर बच्चे और बड़े सभी झूलते हुए खुशी से भर उठते हैं। मिट्टी की भीनी-भीनी महक और पक्षियों की मधुर चहचहाहट वातावरण को और सुहाना बना देती है। प्रकृति का यह रूप सचमुच मनभावन है और हर दिल को भा जाता है।
गाँव का पता ही भूल गया हो। बादल चिट्ठियों की तरह आते हैं, लेकिन बिना संदेश दिए लौट जाते हैं। जिन पर “देवभूमि” लिखा होता है, वहाँ तो मेघदूत की तरह वे आँसू और वज्र के साथ बरसते हैं, पर यहाँ आँगन उमस और प्रतीक्षा में सूखा पड़ा है। खपरैल की छतें अब भी बारिश का पानी सोखने को तैयार बैठी हैं, और पेड़ों से पत्ते पीले होकर झरते जा रहे हैं। इस चित्रण में वर्षा की अनुपस्थिति केवल मौसम का अभाव नहीं है, बल्कि एक गहरी भावनात्मक कमी और विरह का प्रतीक बन जाती है।
आज का खयाल सीधा दिल को छू गया—क्यों न खुद से ही अपनी कीमत पूछी जाए, बजाय दूसरों की नज़रों में ढूँढ़ने के। क्यों न एक ख़त खुद को लिखा जाए, जिसमें अपने ही बचपन की हँसी, अपनी ही रंगीन तितली-सी चंचलता, और अपनी ही खुशबू को फिर से महसूस किया जाए। जीवन की भाग-दौड़ में खोकर हम खुद को सँवारना भूल जाते हैं, लेकिन जब खुद से मुलाक़ात होती है, तो एहसास होता है कि सबसे बड़ा ख़िताब, सबसे सुंदर परिभाषा, हमेशा से हमारे अपने ही नाम थी।
इस बार की यात्रा वैसी नहीं थी जैसी पहले हुआ करती थी। न तस्वीरें देखीं, न डायरी लिखी — मन एक अजीब उचाट, थका और शून्य में डूबा हुआ है। जूड़े के फूलों के बीच अब एक जोड़ी उदास आँखें महसूस होती हैं, जो स्मृतियों की तरह टंगी रह गई हैं। हर बार की तरह यह यात्रा आनंद नहीं, बल्कि एक सैलाब छोड़ गई — भावनाओं का, बिछोह का, और उस प्रेम का जो चुपचाप आता है और सब बहा ले जाता है। इस बार आषाढ़ केवल मौसम नहीं, एक डूबती आत्मा का रूप बन गया है। न प्रतीक्षा है, न वचन, न कोई सहारा — बस एक अंतहीन दूरी, जहाँ अगली मुलाकात की कोई संभावना नहीं। इस प्रेम की परिणति नहीं, केवल आजन्म बिछोह ही लिखा है।