छोड़ो ना अपना क्या जाता है… 

समाज की संवेदनहीनता पर आधारित हिंदी कविता, जिसमें गंदगी, सफाई कर्मी की पीड़ा, पुल हादसा, अस्पताल लापरवाही और शिक्षा के व्यवसायीकरण को दर्शाया गया है

मधु चौधरी, मुंबई

थूक देता है जब कोई सड़क पर,
देख त्योरी मन चढ़ जाता है,
क्षण भर गुस्सा आता है दिल में,
फिर ख्याल यही रह जाता है
अपना क्या जाता है!

हमारी गंदगी साफ़ करने को
जब वो गटर में उतर जाता है,
विषैली गैसों की चपेट में आ
अपनी जान भी गंवा जाता है,
थोड़ा सा दिल तो सिहरता है,
फिर वही सवाल उठ जाता है
अपना क्या जाता है?

नवनिर्मित पुल जब ढह जाता,
कितनों का संसार बिखर जाता है,
परिवारों का उजड़ा आँगन,
आँसू बनकर बह जाता है,
दिल में गुबार तो उठता है,
पर अंत यही दोहराता है
अपना क्या जाता है।

अस्पतालों में बीमार इंसान,
बीमारी से नहीं, इलाज से मर जाता है,
इंसानियत का जनाज़ा उठता,
हर चेहरा बस खामोश रह जाता है,
दर्द कहीं गहराई तक चुभता है,
फिर भी मन बहला जाता है
अपना क्या जाता है?

शिक्षा जब बाजार बन जाती,
सब्ज़ी-सी बिकती नज़र आती है,
पढ़ने वाला मासूम बच्चा
सिस्टम की सूली चढ़ जाता है,
खून खौलता है रग-रग में,
पर अंत यही सुनाई देता है
अपना क्या जाता है?

लेखिका के बारे में-
मधु चौधरी
एक बहुमुखी प्रतिभा की धनी साहित्यकार, शोधकर्ता और शिक्षिका हैं, जो हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। उन्होंने M.Com, ECCE और हिंदी साहित्य में M.A की शिक्षा प्राप्त कर अकादमिक उत्कृष्टता का परिचय दिया है। उनके दो लघु शोध आलेख प्रकाशित हो चुके हैं, जो उनके गहन अध्ययन और शोध दृष्टि को दर्शाते हैं।
वर्ष 2024–2025 में उन्होंने ICSSR के प्रोजेक्ट में रिसर्च असिस्टेंट के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लघुकथा, कविता, साक्षात्कार और आलेख जैसी विधाओं में उनकी रचनाएँ Live Wire Network पर प्रकाशित होती रही हैं। उनकी रचनात्मकता को ‘मेरी निहारिका’ (नवभारत टाइम्स) में प्रकाशित कविताओं के माध्यम से भी व्यापक पहचान मिली है। वर्तमान में वे ‘विरासत’ त्रैमासिक पत्रिका में सह-संपादक के रूप में अपनी साहित्यिक सेवाएँ दे रही हैं। साथ ही, सेंट पॉल कॉलेज ऑफ मास मीडिया एवं कम्युनिकेशन में अतिथि व्याख्याता के रूप में भी सक्रिय हैं। शायरी, व्यंग्य, लघुकथा और साक्षात्कार जैसी विधाओं में उनका लेखन संवेदनशीलता और गहराई से परिपूर्ण है। मुंबई के चित्रनगरी, मन का कोना और मकाम जैसे साहित्यिक मंचों से जुड़कर वे साहित्यिक गतिविधियों में निरंतर सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

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16 thoughts on “छोड़ो ना अपना क्या जाता है… 

  1. बहुत खूब लिखा मधु। बधाई।। ऐसा ही लिखती रहे और मुंबई ओर ग्वालियर का नाम रोशन करे। पुनः बधाई एवं शुभकामनाएं

    1. क्या बात है, जितनी तारीफ़ करें काम है,
      इस सच्चाई को कोई झूठला नाजी सकता 👏

  2. बहुत बढ़िया रचना है। समाज के मर्म को वही समझता है जो समाज का अपने आपको हिस्सा समझता है। आपमें वह समझ और वेदना है। मैं आपकी लेखनी को प्रणाम करता हूं।

    1. हर गलत , गैर- कानूनन काम की सजा सख्ती से दी जाए तो डर से आदमी गलतियों से दूर हो जाता है । सिर्फ कानून का किताबों में होना काफी नहीं है । आम आदमी किसी सुधार के लिए प्रेरित कर सकता है , मजबूर नहीं ।
      बहुत सटीक लेखन ।

      1. धन्यवाद विनीता जी।
        सही कहा आपने साहित्य के माध्यम से हम सिर्फ सोए हुए भावों को जगा सकते हैं

    2. धन्यवाद अवनीश सर
      आपने ही रास्ता दिखाया है, आपके शब्द मेरे लिए प्रेरणा के स्रोत है।

  3. क्या बात है, जितनी तारीफ़ करें कम है,
    इस सच्चाई को कोई झूठला नही सकता 👏

  4. धन्यवाद अवनीश सर
    आपने ही रास्ता दिखाया है, आपके शब्द मेरे लिए प्रेरणा के स्रोत है।

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