होना तो ये चाहिए था कि
पिछली हजार यात्राओं की तरह
इस यात्रा के बाद भी
मैं उसी उल्लास से
डायरी लिखती
तस्वीरें निहारती
और
लिखती यात्रा वृत्तांत
की सुंदर शृंखलाएँ
पर इस दफा
लौटने के बाद
न तो तस्वीरें देखीं
न डायरी के पन्ने खोले
लौटा हुआ मन
जाने क्यों इतना उचाट
विकल और थका-थका सा है
मेरे जूड़े के बाएँ कोने पे
जहाँ मौसमी फूलों के गुच्छे
मैंने खोंस लिए थे
ठीक वहीं एक जोड़ी उदास आँखें टँगी हुई
महसूस हो रही हैं
आषाढ़ के मध्य की
और भी तो यात्राएँ की हैं मैंने
पर विगत किसी भी आषाढ़ में
स्मृतियों के जल जमाव ने
मुझे यूँ आतंकित नहीं किया
मेरे पास तो किसी प्रतीक्षा की नाव भी नहीं
न ही किसी के दिए वचनों की
कोई छतरी है
क्या करूँ
मुझे तो ठीक तैरना भी नहीं आता !
इस साल की यात्रा में उमड़े इस सैलाब से
कैसे निजात पाऊँ?
मुझे याद है बचपन में
माँ पानी वाली जगहों से
मुझे दूर ही रखती थी
पता नहीं ज्योतिषी ने
क्या अशुभ उचारा था !
अगर मुझे ठीक -ठीक
पता होता कि
मेरे प्रारब्ध में किस यात्रा के बाद
डूब कर मरना लिखा है तो
यकीनन मैंने
स्थगित कर दी होती
अपनी सारी यात्राएँ
पर प्रेम के घात से कौन बचा है
वह तो हमेशा
ऐसे हीं दबे पाँव आता है
और
हमें संभलने का मौका दिए बिना
हमारा ग्रास कर जाता है
आषाढ़ की मृत्यु का शोक क्या करना
शोक तो बस उन उदास आँखों का है
जिनके प्रारब्ध में कोई मिलन नहीं
शायद
अगली मुलाकात भी नहीं
बस
आजन्म बिछोह लिखा है ।

रंजीतासिंह ‘फलक’, वरिष्ठ लेखिका, देहरादून एवं नोएडा