छिन चुकी थीं एक छत, जो बँटवारे की भेंट चढ़ गई थी और मजबूरी में बेचनी पड़ी थी.
वैसे तो सविता को ज़मीन-जायदाद से कोई मोह नहीं था, लेकिन एक रहने को घर तो चाहिए ही था जो अपना होता.
पर जमीनी लालची अपनों ने ही उसका घर छीन लिया था.
कानूनी दांव-पेंच में सविता को अपनी पतंग काटने में बरसों लग गए.
जीवन बिखरे तिनकों को समेटने में बीत रहा था.ख्वाहिशों की आग भी अब मध्यम हो चुकी थी.लेकिन ज़िंदगी जीनी थी ज़रूरतें भी रुक-रुक कर चल रही थीं.बच्चों की ज़िम्मेदारियॉं, शादी-ब्याह… सब उसे ही देखना था.
वह सब कुछ प्रभु के ऊपर छोड़ देना चाहती थी,लेकिन… जिनके घर-बार मजबूत और पुश्तैनी नहीं होते उन्हें रिश्ते कहां मिलते हैं?
जाने क्यों, हर कोई रिश्तों से पहले बीता हुआ कल जानना चाहता है.क्यों नहीं दिखता उन्हें वह लड़का या लड़की, जो सामने है जो जीना चाहते हैं.कितने बच्चे ऐसे होते हैं जो टूटे परिवारों के कारण भीतर ही भीतर बिखर जाते हैं्.
गुम हो जाते हैं नशे के गलियारों में, या फिर अवसाद उन्हें घेर लेता है.
वैसे तो हर चीज़ आसान नहीं होती, और ठान लो तो कठिन भी नहीं रहती.एक वक्त ही है, जो रेत-सा फिसलता रहता है.
उम्र अपने पड़ाव पार करती जाती है चॉंदनी ओढ़ती जाती है,जिसे आप चाहकर भी रोक नहीं सकते.

सौम्या दुआ, प्रसिद्ध लेखिका, नैनीताल
