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इस बार मैं चुप रहूंगी

उस दिन एक स्पर्श हवा में ठहर-सा गया था, ठीक उसी क्षण जब शब्दों ने जन्म लेना ही चाहा था। तुम्हारी बात सिर्फ मेरे कानों तक नहीं पहुँची, वह सीधे भीतर तक उतर आई थी। मगर भाषा की गलियाँ उन दिनों बहुत संकरी थीं। खिड़की आधी ही खुली थी और बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—न थमने का, न बरसने का।

स्मृति आज भी वहीं अटकी है, जहाँ तुमने मुझे बिना कुछ कहे देखा था। उस शाम समय बहुत तेज़ी से गुज़र गया था, या शायद वह ऊबकर किनारे खड़ा रह गया था। मुझे लगा था कि तुम कुछ कहना चाहते हो, और मैं अपनी घबराहट में, कुछ न कहकर भी सब कुछ कह चुकी थी। अब अगर तुम फिर से मिलो, तो मैं इस बार चुप रहूँगी। कुछ नहीं कहूँगी—बस तुम्हें लिख दूँगी। और अगर हो सके, तो तुम बस पढ़ लेना।

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आजन्म बिछोह

इस बार की यात्रा वैसी नहीं थी जैसी पहले हुआ करती थी। न तस्वीरें देखीं, न डायरी लिखी — मन एक अजीब उचाट, थका और शून्य में डूबा हुआ है। जूड़े के फूलों के बीच अब एक जोड़ी उदास आँखें महसूस होती हैं, जो स्मृतियों की तरह टंगी रह गई हैं। हर बार की तरह यह यात्रा आनंद नहीं, बल्कि एक सैलाब छोड़ गई — भावनाओं का, बिछोह का, और उस प्रेम का जो चुपचाप आता है और सब बहा ले जाता है। इस बार आषाढ़ केवल मौसम नहीं, एक डूबती आत्मा का रूप बन गया है। न प्रतीक्षा है, न वचन, न कोई सहारा — बस एक अंतहीन दूरी, जहाँ अगली मुलाकात की कोई संभावना नहीं। इस प्रेम की परिणति नहीं, केवल आजन्म बिछोह ही लिखा है।

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