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क्यों है?

राह में काँटों का मंजर बिखरा पड़ा है, फिर भी दिल फूलों की ओर आकृष्ट होता है। दामन भले ही बेवफाई की कहानियों से भरा हो, फिर भी वफ़ाओं पर भरोसा कायम रहता है। उसकी पल-पल रूठने की आदत है, लेकिन नाज़-नखरों को उठाने में वह पीछे नहीं हटता। आँधी और तूफ़ान उसे रोक नहीं पाएंगे, फिर भी यह बात दिल को गर्वित करती है। हरी-भरी वादियों पर उसने लाल रंग डाला, और इसके बावजूद उसे क्षमा किया जाता है। समुंदर की गहराई नापने की कला है उसमें, फिर भी गोता लगाने से डरता है। रोज़-रोज़ बदलता चेहरा देखकर आइना भी हैरान रह जाता है।

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मेरी यायावरी!

मेरी यायावरी ने मुझे एक अनवरत पथगामी बना दिया है, जैसे मैं इस धरा पर रहते हुए भी व्योम का वासी बन गया हूँ। मन को पल भर का चैन नहीं मिलता। स्मृतियों का इतिहास वह निरंतर रचता रहता है और क्षणभंगुर जीवन में नए-नए आकाश गढ़ता रहता है।

कभी यह मन वृक्ष की ऊँची फुनगी पर जा बैठता है, मधुर राग बनकर इतराता है। अगले ही पल जब तेज़ हवा का झोंका आता है तो तंद्रा भंग हो जाती है और यह यथार्थ की ज़मीन पर धड़ाम से गिर पड़ता है।

हर क्षण एक मृदुल तरंग उठती है। शब्दों के घाट पर नंगे पाँव घूमती भावनाएँ अकुलाई-सी मोती चुनती रहती हैं। उन्हीं मोतियों से स्वर्णिम अभिव्यक्तियाँ जन्म लेती हैं और तभी एक नया काव्य आकार पाता है

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ग़ज़ल

दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम। हमारे दर्द को समझे नहीं वो,तो अपने मन को मैला क्यों करें हम। उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम। जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम। मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला…

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आजन्म बिछोह

इस बार की यात्रा वैसी नहीं थी जैसी पहले हुआ करती थी। न तस्वीरें देखीं, न डायरी लिखी — मन एक अजीब उचाट, थका और शून्य में डूबा हुआ है। जूड़े के फूलों के बीच अब एक जोड़ी उदास आँखें महसूस होती हैं, जो स्मृतियों की तरह टंगी रह गई हैं। हर बार की तरह यह यात्रा आनंद नहीं, बल्कि एक सैलाब छोड़ गई — भावनाओं का, बिछोह का, और उस प्रेम का जो चुपचाप आता है और सब बहा ले जाता है। इस बार आषाढ़ केवल मौसम नहीं, एक डूबती आत्मा का रूप बन गया है। न प्रतीक्षा है, न वचन, न कोई सहारा — बस एक अंतहीन दूरी, जहाँ अगली मुलाकात की कोई संभावना नहीं। इस प्रेम की परिणति नहीं, केवल आजन्म बिछोह ही लिखा है।

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