संघर्ष, संवेदना और आत्मविश्वास से सजी लेखिका मनीषा मारु की साहित्यिक यात्रा

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
कुछ सपने ऐसे होते हैं, जो परिस्थितियों के शोर में भी भीतर कहीं जीवित रहते हैं और सही समय आने पर अपनी पहचान बना लेते हैं। शब्दों और भावनाओं से बचपन से आत्मीय रिश्ता रखने वाली इस लेखिका और कवयित्री की साहित्यिक यात्रा भी ऐसे ही एक सपने के साकार होने की कहानी है। माँ से मिले लेखन संस्कार, जीवन के विविध अनुभवों, परिवार के सहयोग और निरंतर सीखने की जिज्ञासा ने उनकी लेखनी को नई दिशा दी।
कंप्यूटर शिक्षिका से गृहिणी और फिर साहित्य के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँची उनकी यात्रा संघर्ष, आत्मविश्वास और रचनात्मकता का सुंदर संगम है। वर्ष 2024 में माता-पिता की स्वर्ण जयंती के अवसर पर प्रकाशित प्रथम काव्य-संग्रह ‘कुमकुम लगे पाँव’ उनके लिए केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि वर्षों से संजोए सपने का साकार रूप है। विराटनगर, नेपाल में रहते हुए भी हिंदी साहित्य से उनका जुड़ाव सीमाओं से परे है। लेखन के साथ नृत्य, संगीत, पेंटिंग, स्केचिंग, बागवानी, हस्तकला और मेहंदी जैसी विविध रचनात्मक रुचियाँ उनकी संवेदनाओं को और समृद्ध करती हैं। बातचीत में उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा, ‘कुमकुम लगे पाँव’ की भावनात्मक कहानी, जीवन के संघर्षों, परिवार के सहयोग और नई पीढ़ी की महिला रचनाकारों के लिए अपने संदेश को बेबाकी और आत्मीयता से साझा किया .प्रस्तुत हैं लेखिका मनीषा मारु से लाइव वायर न्यूज के संपादक सुरेश परिहार से बातचीत के मुख्य अंश-

प्रश्न-स्कूली जीवन से ही लेखन के प्रति आपकी रुचि रही है. उस शुरुआती दौर की कौन-सी स्मृतियाँ या घटनाएँ थीं, जिन्होंने आपको लेखिका और कवयित्री बनने की दिशा में प्रेरित किया?
उत्तर-बचपन से ही शब्दों और भावों से मेरा आत्मीय रिश्ता रहा। कक्षा पाँच में वार्षिक समारोह के दौरान वीर-रस की कविता “खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी” की प्रस्तुति पर मुझे प्रथम पुरस्कार मिला। सिलीगुड़ी की ‘जनपथ’ पत्रिका, सामाजिक संस्थाओं और विद्यालय की पुस्तिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित होती रहीं।लेखन का यह संस्कार मुझे अपनी माँ से विरासत में मिला, जो स्वयं भी बहुत सुंदर लिखती हैं। उन्हीं के संस्कार और माँ शारदे की कृपा से भीतर पड़ा लेखनी का बीज समय के साथ अंकुरित होकर आज मेरी पहचान बन गया है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि लेखन मेरी पहचान बनेगा।
प्रश्न– आपने कहा है कि माँ शारदे की कृपा से आपकी लेखनी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक मंचों तक पहुँची. इस यात्रा में आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण मोड़ कौन-सा रहा और कौन-सा सम्मान आपके दिल के सबसे करीब है?
उत्तर-मेरे लिए साहित्यिक यात्रा का हर पड़ाव महत्वपूर्ण और यादगार रहा है, क्योंकि हर मंच ने मुझे सीखने और बेहतर करने का अवसर दिया। कोरोना काल मेरी लेखनी के लिए एक खूबसूरत मोड़ रहा। Momspresso मंच पर लिखी मेरी कहानी ‘मेरी दीदी की सास बनी मेरी सेंटा’ टॉप ब्लॉग विजेताओं में चयनित होकर पुरस्कृत हुई। इस उपलब्धि ने मेरे भीतर लेखनी को लेकर ऐसा आत्मविश्वास जगाया, मानो मेरे शब्दों को नए पंख मिल गए हों।राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों से जुड़ना मेरे लिए गौरव की बात है, लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान पाठकों का स्नेह और उनकी प्रतिक्रिया है। जब कोई कहता है—“आपने मेरे मन की बात लिख दी,” तो लगता है जैसे कुबेर का खजाना मिल गया हो।

प्रश्न-गृहिणी की जिम्मेदारियों के साथ साहित्य सृजन को समय देना आसान नहीं होता. आपने परिवार, निजी जीवन और लेखन के बीच संतुलन कैसे बनाया?
उत्तर-सच कहूँ तो परिवार और लेखन के बीच संतुलन बनाना मेरे लिए समय के साथ सीखी हुई एक खूबसूरत कला है। मैं मानती हूँ कि गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियाँ अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मैंने अपनी इच्छाओं और रचनात्मकता को कभी पूरी तरह मुरझाने नहीं दिया। जब जिस काम के लिए समय मिला, मैंने उस समय का सदुपयोग करते हुए उसे पूरे मन से जिया।
हर कदम पर मेरे जीवनसाथी और बच्चों का स्नेह, सहयोग और विश्वास मेरी सबसे बड़ी ताकत रहा है। उनके साथ ने मुझे जिम्मेदारियों के साथ-साथ अपने सपनों, शौक और रचनात्मकता को भी समय देने का हौसला दिया। मेरा मानना है कि परिवार के लिए जीना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी अपनी पहचान और अपने सपनों को जीवित रखना भी है। क्योंकि जब अंतर्मन की खुशियाँ साथ चलती हैं, तब जिम्मेदारियों का सफर भी सहज, सुंदर और सुखद बन जाता है।

प्रश्न– आपने विवाह से पहले कंप्यूटर शिक्षिका के रूप में कार्य किया और बाद में लेखन सहित कई रचनात्मक क्षेत्रों से जुड़ी रहीं. क्या आपको लगता है कि जीवन के अलग-अलग अनुभवों ने आपकी लेखनी को एक विशेष दृष्टिकोण दिया है?
उत्तर-निश्चित रूप से, मेरे जीवन के हर पड़ाव ने मेरे विचारों, एहसासों और लेखनी को एक नया रंग दिया है। कंप्यूटर शिक्षिका के रूप में अनुशासन, धैर्य और लोगों को समझना सीखा, तो गृहस्थ जीवन ने रिश्तों की गहराई, जिम्मेदारियों और भावनाओं को करीब से महसूस करना सिखाया। प्रकृति, कला, संगीत और जीवन के छोटे-बड़े अनुभवों ने मेरी संवेदनाओं को और समृद्ध किया। मुझे लगता है, मेरी लेखनी मेरे जीवन का इंद्रधनुष है. हर अनुभव उसका एक रंग है। कभी रिश्तों की गर्माहट, कभी संघर्षों का साहस, कभी सपनों की उड़ान, तो कभी जीवन की अनकही पीड़ा मेरी पंक्तियों में उतर आती है। इसलिए मेरी रचनाएँ केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि मेरे जिए हुए पलों, महसूस किए एहसासों और मन की अनकही धड़कनों का सच्चा प्रतिबिंब हैं।
प्रश्न-आपने किसी भी विधा में औपचारिक शिक्षा या प्रशिक्षण न लेने के बावजूद साहित्य के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई. आपके अनुसार एक रचनाकार के लिए औपचारिक प्रशिक्षण अधिक महत्वपूर्ण है या सीखने की निरंतर जिज्ञासा?
उत्तर-औपचारिक शिक्षा और प्रशिक्षण का अपना महत्व है, लेकिन मेरे लिए सीखने की असली शक्ति जिज्ञासा और निरंतर सीखने की चाह रही है। मैंने साहित्य की किसी विशेष विधा का औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया, फिर भी जीवन के अनुभवों, अध्ययन और संवेदनाओं ने मेरी लेखनी को नई दिशा दी है।मेरा मानना है कि लेखन केवल शब्दों को कागज पर उतारना नहीं, बल्कि स्वयं से संवाद करने और अनुभवों को नए अर्थ देने की निरंतर यात्रा है। हर रचना मुझे कुछ नया सिखाती है और मेरी कमियाँ मुझे बेहतर बनने की प्रेरणा देती हैं। पढ़ना, दूसरों से सीखना, आत्ममंथन करना और निरंतर स्वयं को निखारना यही मेरी साहित्यिक यात्रा की आधारशिला है।मैं आज भी स्वयं को एक विद्यार्थी मानती हूँ, क्योंकि साहित्य में सीखने की कोई अंतिम मंजिल नहीं। यही सीखने की ललक और हर दिन बेहतर बनने की चाह मेरी साहित्यिक यात्रा की सबसे बड़ी पूँजी है।

प्रश्न– आपका प्रथम काव्य-संग्रह “कुमकुम लगे पाँव” वर्ष 2024 में आपके माता-पिता के हाथों लोकार्पित हुआ. इस पुस्तक के पीछे की भावनात्मक यात्रा और इसके शीर्षक के पीछे की कहानी हमारे पाठकों के साथ साझा करें.
उत्तर-“कुमकुम लगे पाँव” मेरे लिए केवल काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि वर्षों से संजोए एक स्वप्न का साकार रूप है। वर्ष 2024 में मेरे मम्मी-पापा की स्वर्ण जयंती को यादगार बनाने के लिए मैंने उन्हें अपनी पहली पुस्तक उपहार में देने का संकल्प लिया। लगभग एक महीने तक दिन-रात एक करके इसे पूरा किया। जब इसका लोकार्पण मेरे माता-पिता के कर-कमलों से हुआ, तो सारी थकान खुशी में बदल गई। वह पल मेरे जीवन की सबसे अनमोल स्मृतियों में बस गया।इस सफर में मेरे जीवनसाथी और बच्चों का पूरा सहयोग मिला। वे घर की जिम्मेदारियाँ संभालकर कहते, “तुम अपनी तैयारी करो।” उनका इतना कहना मेरा आत्मविश्वास बढ़ाने का सबसे बड़ा संबल था।“कुमकुम लगे पाँव” स्त्री जीवन की पूरी यात्रा का प्रतीक है। कुमकुम लगते ही उसकी दुनिया बदलती है।
बचपन की स्मृतियों से निकलकर वह रिश्तों, जिम्मेदारियों और संघर्षों की दुनिया में प्रवेश करती है। अपने आत्मसम्मान और सपनों के लिए लड़ते हुए वह कई बार टूटती-बिखरती है, फिर भी हर बार स्वयं को समेटकर उठ खड़ी होती है।मेरे काव्य-संग्रह में प्रभु में विश्वास, बचपन, रिश्ते, जिम्मेदारियाँ, संघर्ष, आत्मसम्मान, हौसला, सपने और जीवन के हर रंग की झलक है। यह केवल मेरी नहीं, उन अनगिनत स्त्रियों की आवाज़ है, जो जिम्मेदारियों के बीच भी अपने सपनों को जीवित रखती हैं। और सबसे बड़ी बात माता-पिता का ऋण चुकाया नहीं जा सकता, लेकिन अपनी उपलब्धियों से उनके चेहरे पर गर्व और मुस्कान जरूर लाई जा सकती है।

प्रश्न– आपकी रुचियों में लेखन के साथ नृत्य, संगीत, स्विमिंग, स्केचिंग, पेंटिंग, बागवानी, हस्तकला और मेहंदी कला जैसी अनेक विधाएँ शामिल हैं. इन विविध रचनात्मक रुचियों का आपकी कविता और लेखन पर किस तरह प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-मेरे लिए रचनात्मकता किसी एक विधा तक सीमित नहीं है। कभी रंगों और स्केचिंग से मन की बात कहती हूँ, तो कभी शब्दों में भावों के रंग भरती हूँ। पेंटिंग और स्केचिंग ने मुझे कल्पनाशीलता और एकाग्रता, सिलाई और मेहंदी ने धैर्य व बारीकी, स्विमिंग ने आत्मविश्वास व अनुशासन और बागवानी ने प्रतीक्षा व निरंतरता का महत्व सिखाया। संगीत और नृत्य मेरे लिए भावों की गहराई और मन के सुकून का माध्यम हैं।जैसे एक बीज को पौधा बनने और फूल देने में समय, प्रेम और देखभाल चाहिए, वैसे ही जीवन में भी हर सुंदर परिणाम अपने समय पर मिलता है, बस प्रयास आपका जारी रहना चाहिए। इन सभी अनुभवों ने मेरी संवेदनाओं को समृद्ध किया है और प्रकृति, रिश्तों व जीवन के विविध रंग मेरी लेखनी में सहज रूप से उतर आते हैं।

प्रश्न-आपने जीवन की विपरीत परिस्थितियों को हमेशा चुनौती के रूप में स्वीकार किया और ‘डर’ को खुद पर हावी नहीं होने दिया. आपके जीवन में ऐसी कौन-सी चुनौती रही, जिसने आपको भीतर से सबसे अधिक मजबूत बनाया?
उत्तर-जीवन की परिस्थितियाँ हमेशा हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होतीं। जीवन में कई बार उतार-चढ़ाव के साथ ऐसे दौर भी आए, जब मैंने जिम्मेदारी के साथ घर और बाहर, दोनों को अकेले संभाला, जो मेरे लिए निश्चित ही एक बड़ी चुनौती का रूप लेकर आया था। कई बार परिस्थितियाँ कठिन लगीं, लेकिन मैंने ‘डर’ शब्द को कभी भी खुद पर हावी नहीं होने दिया।मैंने उस समय जिम्मेदारियों से भागने के बजाय उन्हें अपनी शक्ति बनाया। धीरे-धीरे महसूस किया कि हम अपने भीतर जितनी शक्ति समझते हैं, उससे कहीं अधिक सामर्थ्य हमारे अंदर भरा होता है। आज पीछे मुड़कर जब भी देखती हूँ तो लगता है कि उन परिस्थितियों ने मुझे तोड़ा नहीं, बल्कि और मजबूत बनाया। सच कहूँ तो संघर्षों ने मुझे जीवन जीना ही नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के साथ परिस्थितियों का सामना करना भी सिखाया।
प्रश्न– वर्तमान में विराटनगर, नेपाल में रहते हुए आप राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक मंचों से जुड़ी हैं. नेपाल में रहते हुए हिंदी साहित्य और साहित्यिक गतिविधियों को देखने का आपका अनुभव भारत की तुलना में किस तरह अलग है?
उत्तर-विराटनगर, नेपाल में रहते हुए मुझे यह अनुभव हुआ कि साहित्य की कोई वास्तविक सीमा नहीं होती। भाषा और भावनाएँ सीमाओं से परे जाकर लोगों को जोड़ती हैं। भारत हिंदी साहित्य की विशाल और समृद्ध परंपरा का केंद्र है, वहीं मेरी कर्मभूमि नेपाल में रहते हुए मुझे हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति गहरा आत्मीय जुड़ाव महसूस हुआ। कोरोना काल मेरे लिए भी एक चुनौतीपूर्ण समय था, लेकिन इसी दौर ने मुझे साहित्य से और गहराई से जुड़ने का अवसर दिया। घर तक सीमित रहते हुए मैंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक मंचों से जुड़कर अपनी लेखनी को नई दिशा दी। अनेक ऑनलाइन साहित्यिक आयोजनों, काव्य-पाठ और रचनात्मक मंचों ने मुझे देश-विदेश के साहित्यकारों से संवाद करने और अपनी रचनाएँ साझा करने का अवसर दिया। आज नेपाल की धरती पर रहते हुए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक मंचों से जुड़ना मेरे लिए न केवल सौभाग्य, बल्कि भारत-नेपाल की साझा साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का एक सुंदर माध्यम भी है।
प्रश्न-आज जब साहित्य के साथ सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, आप नई पीढ़ी के रचनाकारों और विशेष रूप से महिला लेखिकाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी, ताकि वे अपनी पहचान बनाने के साथ अपने सपनों को भी जीवंत रख सकें?
उत्तर-अपने श्रोताओं, पाठकों और प्रियजनों से बस इतना कहना चाहूँगी कि अपने सपनों को कभी छोटा मत समझिए और अपनी पहचान को परिस्थितियों के हवाले मत कीजिए।विशेषकर नारी शक्ति से कहना चाहूँगी कि परिवार और जिम्मेदारियों के साथ अपने सपनों और प्रतिभा के लिए भी थोड़ा समय जरूर निकालें। अपने लिए बचाया गया समय स्वार्थ नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व का सम्मान है।मेरे लिए साहित्य केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन से सीखने और किसी के मन में उम्मीद जगाने का माध्यम है। सोशल मीडिया के इस दौर में आगे बढ़ें, लेकिन लोकप्रियता की होड़ में अपनी मौलिकता और सच्चाई को कभी न खोएँ। पढ़ते रहिए, सीखते रहिए और अपने हौसले को परिस्थितियों से बड़ा रखिए। सीखने की कोई उम्र नहीं, सपनों की कोई सीमा नहीं और शुरुआत के लिए कभी देर नहीं होती। अंततः इतना ही कहना चाहूँगी अपने जीवन के सूत्रधार हम स्वयं हैं। अपने जीवन की बागडोर न परिस्थितियों के हाथों सौंपिए, न रिश्तों के; क्योंकि अपने सपनों को साकार करने की पहली जिम्मेदारी भी हमारी ही है।

Waah शानदार शख्सियत ❤️
🙏हृदय से आभार🙏
🙏निःशब्द हूँ… 🙏माँ वीणावादिनी की कृपा पर। 🙏✨
आपसे जुड़ना, अपने शब्दों और भावों को आपके साथ साझा करना और फिर उन्हीं शब्दों को आपके माध्यम से अनगिनत लोगों तक पहुँचते देखना—मेरे लिए अत्यंत भावुक और सुखद अनुभव है।🌹
आपने मेरे लेखन को लेकर जो प्रश्न किए, उनका उत्तर देते हुए मुझे लगा जैसे मैं अपने ही जीवन के उन अनगिनत पलों को फिर से जी रही हूँ।🌹
मेरी लेखनी को समझने, मेरी भावनाओं को स्थान देने और इस संवाद को अपने न्यूज़ चैनल के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाने के लिए आपका हृदय से आभार। 🙏
आपके सवाल मेरे लिए केवल सवाल नहीं थे, बल्कि स्वयं को और गहराई से जानने का एक सुंदर अवसर था। आपने मेरी यात्रा, मेरे शब्दों और मेरे भीतर की रचनात्मकता को जो सम्मान दिया, उसके लिए शब्द शायद भी कम पड़ जाएँ।✍️
दिल से धन्यवाद… मेरी लेखनी को एक नया मंच, मेरे शब्दों को नई उड़ान और मेरी भावनाओं को नए पाठकों तक पहुँचाने के लिए। 💐🙏
माँ वीणावादिनी🙏 की कृपा यूँ ही बनी रहे और शब्दों का यह सुंदर सफ़र निरंतर चलता रहे। 🙏✨
सराहनीय 👏💐😍
Thank you @Moshmi ji shukriya aapka