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आत्मा का समर्पण

शिव पार्वती का दिव्य मिलन दर्शाती भावपूर्ण हिंदी कविता, तप और समर्पण का प्रतीक

शिव और पार्वती का अलौकिक प्रेम

डॉ. रुपाली गर्ग, मुंबई

हिमालय की गोद में जन्मी एक चाह,
मन में बस एक ही नाम महादेव,
नयन बंद कर हर श्वास में पुकारा,
“स्वामी… तुम ही मेरे सत्य, तुम ही मेरे देव।”

कठोर तप की धूप में तपती रही,
विरह की रातों में दीप-सी जलती रही,
हर ऋतु बदली, हर पल बीता,
पर पार्वती का प्रण अटल ही रहा।

कैलाश पर बैठे थे शिव
वैराग्य ओढ़े, समाधि में लीन,
पर भीतर कहीं एक स्पंदन था,
जो पुकारता था उस नारी को अधीन।

जब पहली बार दृष्टि मिली,
समय भी जैसे ठहर-सा गया,
तप का हर कण सफल हो उठा,
विरह का हर आँसू मोती बन गया।

यह प्रेम माँग नहीं था,
न कोई शर्त, न कोई अभिमान,
यह तो आत्मा का वह समर्पण था,
जहाँ “मैं” मिटे और “हम” बने प्राण।

शिव की जटाओं में गंगा बहती,
पार्वती की आँखों में विश्वास,
दोनों का मिलन सृष्टि बना,
दोनों का संग ही जीवन का प्रकाश।

डॉ. रुपाली गर्ग
एक शिक्षिका, लेखिका और साहित्य साधिका हैं, जिन्होंने बरेली विश्वविद्यालय से पीएचडी तथा चेन्नई से MBA किया है।वे पिछले 2 वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं और अब तक 300 से अधिक रचनाओं का सृजन कर चुकी हैं।
उनकी लेखनी में स्त्री, जीवन, वियोग और अनुभवों की गहराई झलकती है, साथ ही उन्हें जासूसी और दर्शनशास्त्र आधारित साहित्य पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।
उनकी रचनाएँ 500+ साझा संकलनों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, तथा वे कई साहित्यिक सम्मेलनों की गरिमा बढ़ा चुकी हैं. साथ ही उनकी 2 पुस्तकें प्रकाशित हैं और वे विभिन्न साहित्यिक मंचों पर उपाध्यक्ष एवं सह-संस्थापिका के रूप में सक्रिय हैं।

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