
डॉ. रुपाली गर्ग, मुंबई
जीवन की सच्चाई अक्सर सतह पर नहीं, उसकी गहराइयों में छिपी होती है। इसे समझने के लिए हमें कभी-कभी ठहरकर अपने भीतर झांकना पड़ता है। मेरे जीवन में भी एक ऐसा ही अनुभव आया, जिसने मुझे जीवन की गहराई से परिचित कराया।
यह उन दिनों की बात है जब सब कुछ होते हुए भी मेरे मन में एक अजीब-सा खालीपन था। काम था, साधन थे, लोगों का साथ भी था. फिर भी भीतर एक अधूरापन महसूस होता था। मैं समझ नहीं पा रही थी कि आखिर कमी कहाँ है।एक दिन मैं अकेले ही पास के एक शांत स्थान पर चली गई। वहाँ न कोई शोर था, न कोई भागदौड़ सिर्फ सन्नाटा और प्रकृति की हल्की-सी आवाज़ें थीं। मैं चुपचाप बैठ गई और अपने जीवन के बारे में सोचने लगी।धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि मैं हमेशा बाहरी चीज़ों में खुशी खोजती रही. सफलता, प्रशंसा और दूसरों की स्वीकृति में। लेकिन मैंने कभी अपने भीतर झांककर यह नहीं देखा कि असली संतोष कहाँ है।उसी शांत क्षण में मुझे समझ आया कि जीवन की सच्ची खुशी बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आत्म-संतोष और आत्म-स्वीकृति में होती है। जब तक हम खुद को स्वीकार नहीं करते, तब तक कोई भी उपलब्धि हमें पूर्ण नहीं कर सकती।
उस दिन के बाद मैंने अपने जीवन में एक बदलाव लाने का निर्णय लिया। मैंने खुद के साथ समय बिताना शुरू किया, अपनी भावनाओं को समझने की कोशिश की और छोटी-छोटी बातों में संतोष ढूंढना सीखा।
अब मुझे महसूस होता है कि जीवन की गहराई इसी में है कि हम अपने भीतर की शांति को पहचानें और उसे बनाए रखें।
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