नारी शक्ति का प्रतीक भारतीय महिला, जिसमें दुर्गा, मीरा और रानी लक्ष्मीबाई के रूपों की झलक दिखाई दे रही है

स्त्री की वाणी

वह केवल एक स्त्री नहीं, बल्कि अनगिनत रूपों का संगम है दर्द को आँखों में समेटे हुए भी अडिग खड़ी। वह चौखट की मर्यादा भी है और जीवन की हर जिम्मेदारी का आधार भी। कभी दुर्गा बनकर शक्ति का प्रतीक बनती है, तो कभी मीरा बनकर भक्ति में विलीन हो जाती है। उसके भीतर द्रौपदी की प्रतिज्ञा है, पद्मिनी का त्याग है और झांसी की रानी सा साहस भी। वह मौन रहकर भी बहुत कुछ कहती है, सहनशीलता में भी आग समेटे रहती है। वही मां है, वही बेटी और उसी से इस संसार की हर कहानी, हर रिश्ते और हर अस्तित्व की शुरुआत होती है।

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नारी शक्ति का प्रचंड रूप, दुर्गा और काली के स्वरूप में अन्याय के खिलाफ खड़ी महिला

रूदन नहीं हुंकार चाहिए

यह कविता नारी के उस रूप को उजागर करती है जो केवल सहन नहीं करती, बल्कि अन्याय के खिलाफ हुंकार भरती है। जब अत्याचार सीमा पार करता है, तो वही नारी काली, दुर्गा और लक्ष्मीबाई बनकर अन्याय का अंत करती है।

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एक छोटी लड़की चूल्हे और किताबों के बीच खड़ी, पढ़ाई और अपने सपनों की ओर बढ़ने की इच्छा दर्शाती हुई।

चूल्हे से किताब तक

खुशबू गोयल माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,पापा, आप ही समझाओ न।नहीं पकड़नी ये करछी मुझको,ज़रा कलम तो पकड़ाओ न। भैया भी तो पढ़ने जाता है,मुझको भी तो पढ़ाओ न।माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,पापा, आप ही समझाओ न। मेरे भी तो सपने हैं,करने उनको अपने हैं।मत सुलगाओ चूल्हे की अग्नि में मुझको,विद्यालय…

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आत्मविश्वास से भरी महिला, आईने के सामने खड़ी, अपनी पहचान और सच्चाई को दर्शाती हुई

कविता हूँ मैं

कविता हूँ मैं’ एक सशक्त और बेबाक रचना है, जो स्त्री के आत्मसम्मान, पहचान और सच को उजागर करती है। यह कविता समाज की संकीर्ण सोच पर तीखा प्रहार करते हुए खुद को आईने की तरह प्रस्तुत करती है, जो सच्चाई को ज्यों का त्यों दिखाती है।

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विभिन्न वर्गों के लोग एक साथ खड़े, समानता और एकता का प्रतीक

समरस समाज

भेदभाव की दीवारें टूटें,और मानवता समाज की नींव बने. यही सच्ची प्रगति है।जब हर व्यक्ति को समान अधिकार मिलेगा,तभी एक सशक्त और समरस समाज का निर्माण होगा।

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अंधेरी गुफा में झरोखे से आती धूप और बाहर खिलते फूल, आशा और विश्वास का प्रतीक

बहुत सुंदर है दुनिया

अविश्वास की अंधेरी दीवारों के बीच भी,
एक छोटा सा झरोखा खुल सकता है.
जहाँ से उजली धूप भीतर आए और जीवन फिर से वसंत बन जाए।क्योंकि अंततः,हमें मानना ही पड़ता है. सचमुच बहुत सुंदर है दुनिया।

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काँटों के बीच खिला हुआ लाल गुलाब, दर्द और खूबसूरती का प्रतीक

फूल

काँटों के बीच खिला वह फूल केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं था, बल्कि सहनशीलता की जीवित मिसाल था।
हर पंखुड़ी में छुपा दर्द, हर खुशबू के पीछे अनगिनत चोटों की कहानी थी।उसने सिखाया-ज़िंदगी में खूबसूरती नाज़ुक होने में नहीं,बल्कि टूटकर भी महकते रहने में है।

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