“यादों का लिफाफा”

इस कविता में एक संतान अपनी माँ की यादों और सीख को भावनात्मक रूप में संजोती है। माँ द्वारा दिए गए एक पुराने खत में छिपे भाव उसे आज भी संबल देते हैं। माँ की कही बातें, उसके एहसास, और उसका साथ — सब कुछ आज भी दिल की अलमारी में सजे हुए हैं। वह मानती है कि वह माँ जैसी नहीं बन सकी, लेकिन माँ से जीवन की सच्ची बातें सीखी हैं — मोहब्बत, यारी और कठिनाइयों में टूटे बिना जीना। उजालों की प्रतीक्षा में अंधेरों से जो उसने पाया, वो भी माँ की दी हुई रोशनी से ही संभव हो पाया।

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खण्डहरों में घर बसाना ही तो ज़िंदगी है….

ज़िंदगी सिर्फ आसान रास्तों का नाम नहीं है। असली ज़िंदगी तो तब शुरू होती है जब इंसान खंडहरों में भी एक घर बसाने का हौसला रखता है। जब आंसुओं के बीच भी मुस्कुराना न छोड़े, और जब नामुमकिन लगने वाले हालातों को मुमकिन बना देने का साहस दिखाए। मौसम बदलते रहेंगे, कभी उजाले होंगे तो कभी शामें भी उतरेंगी। लेकिन जो इंसान मुश्किलों से डरे नहीं, उन्हें अपना गुरु माने, वही बुलंदियों को छू पाता है। अंधेरे आते हैं, अमावस भी होती है, पर उसी के बीच से चांदनी भी निकलती है — जो इस सच्चाई को समझ ले, वही सच्चे अर्थों में जीना जानता है।

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जीना इसी का नाम है..

क्या जीवन में सहज हो जाना वास्तव में इतना आसान होता है? क्या गिरकर, रोकर चुप हो जाना सरल होता है? कुछ पाकर उसे खो देना, कठिन समय में भी मजबूत बने रहना — यह सब आसान नहीं होता। खासकर एक स्त्री के लिए, जो सही होते हुए भी चुपचाप गलत सुनी जाती है, मूक रह जाती है। फिर भी, स्त्रियाँ यह सब सहती हैं, चोट खाकर भी मुस्कुराना सीख जाती हैं। उनके लिए जीना बस यूँ ही गुनगुनाते हुए आगे बढ़ते रहना है, क्योंकि असल में — जीना इसी का नाम है।

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हौसले की लौ…

यह कविता आत्मबल, साहस और जीवन संघर्षों के बावजूद आगे बढ़ते रहने की एक सशक्त अभिव्यक्ति है। इसमें कवि अपने जीवन की यात्रा को एक पर्वतारोहण की तरह प्रस्तुत करता है, जहां रास्ता कठिन है, पर मंज़िल की चाह अडिग है।

प्रारंभिक पंक्तियाँ प्रेरणादायक हैं — आँधियों और तूफानों को भी मात देने वाले उस ‘हौसले के दिए’ की बात होती है, जो अंधेरे में भी मार्ग दिखाता है। इसके बाद कविता सपनों की उड़ान की बात करती है, और बताती है कि थकना, रुकना या पीछे हटना विकल्प नहीं है।

यह एक ऐसा जोश भरा गीत है, जो संघर्षों को गीतों में पिरोकर उन्हें प्रेरणा में बदल देता है। वक्त ने चाहे कितनी भी सख्ती दिखाई हो, लेकिन वक्त ही नई रोशनी भी लाएगा — इस उम्मीद को कवि ने ‘नूर’ और ‘दीप’ जैसे प्रतीकों से दर्शाया है।

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आज ही सुना जाए

“हर दिन एक नई शुरुआत लेकर आता है, और आज का दिन भी कुछ सवालों, कुछ संभावनाओं के साथ हमारे सामने खड़ा है। बीते कल की उलझनों और आने वाले कल की चिंता में उलझे रहना स्वाभाविक है, लेकिन यदि हम ठान लें कि ‘आज’ को ही जिएंगे, तो वही सबसे बड़ा समाधान होगा। यह कविता हमें प्रेरित करती है कि हम बीते कल की चिंताओं और भविष्य की अनिश्चितताओं को छोड़कर, आज की चुनौतियों को आज ही हल करें और जीवन में नवीनता लाएं। ‘आज ही कल के कर्म को क्रम से लिया जाए’—यह संदेश हर उस व्यक्ति के लिए है जो आत्मनिर्भरता और वर्तमान में जीने की भावना को अपनाना चाहता है।”

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ना रोक खुद को अब…

हर कठिनाई से लड़ने की ताकत रखती है तू, तो फिर सुन स्त्री, अब अपने स्त्री होने पर शर्म नहीं, गर्व किया कर। जहाँ मन लगे, वहाँ दिल लगाना तेरा अधिकार है, और आईने में मुस्कुराकर खुद को पहचानना भी। तू सिर्फ जिम्मेदारियों में नहीं, हक़ में भी जी सकती है – खुद से प्यार कर, खुद को सजा, और दुनिया को दिखा कि तू क्या है।”

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जागरण को जी रही हूँ…

“जागरण को जी रही हूँ, याद को प्रहरी बनाकर… मैं अब दर्द को मुस्कुराकर आज़माना चाहती हूँ। भोर की आसावरी में चेतना के छंद लिखना, सरित की लहरों के साथ प्यास के अनुबंध रचना और अनमनी यामिनी को चाँद का झाँसा दिखाना… यही अब जीवन का नया संकल्प है। चार दिन की ज़िन्दगी को प्यार से सजाना, नफ़रत को मात देना और हर मुश्किल को आसान बनाना—बस यही है मेरी नई यात्रा का उद्देश्य।”

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मेरे पापा – मेरी ताक़त”

“जब दुनिया ने मुँह मोड़ा, राहें सब सूनी थीं,
पापा के आँगन में उम्मीदें बस जीती थीं।
हर हार में उन्होंने मुझे मुस्कराना सिखाया,
हर गिरने पर खुद उठकर चलना सिखाया।
पापा — आप मेरे भगवान हैं इस ज़मीं पर,
आपके बिना ये जीवन अधूरा सा है हर पल।”

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