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खण्डहरों में घर बसाना ही तो ज़िंदगी है….

खण्डहरों में घर बसाना ही तो ज़िंदगी है,
क्रन्दनों में मुस्कुराना ही तो ज़िंदगी है।
गर इरादे हैं अटल, कुछ भी नामुमकिन नहीं,
नामुमकिन को मुमकिन बनाना ही तो ज़िंदगी है।

मौसम तो सदा बदलते रहेंगे,
शाम होगी और सूरज ढलते रहेंगे।
मुश्किलों से न कभी ख़ौफ़ खाना,
बुलंदियों पे पहुँचा जिसने ये जाना —
मुश्किलों पर विजय पाना ही तो ज़िंदगी है।
खण्डहरों में…

अमावस भी होगा और चाँदनी भी,
यहाँ दिन भी होगा और यामिनी भी।
इन अंधेरों में तू कहीं खो न जाना,
वही तो जिया है जिसने ये माना —
खुशी और ग़म संग निभाना ही तो ज़िंदगी है।
खण्डहरों में…

गर्दिशों में रहे या रहे रंजिशों में,
कोई लाख बाँधे तुझे बंदिशों में।
डगर से न तू कभी डगमगाना,
भावों के भँवर में कहीं फँस न जाना —
भँवर से मोती चुराना ही तो ज़िंदगी है।
खण्डहरों में…

चलाचल पुकारे तुझे तेरी मंज़िल,
लहरों से लड़कर ही मिलता साहिल।
सुदृढ़ इरादों को कर तू अपने,
साकार होंगे तभी तेरे सपने —
सपनों को हक़ीक़त बनाना ही तो ज़िंदगी है।
खण्डहरों में…

डॉ. शशिकला पटेल, असिस्‍टेंट प्रोफेसर मुलुंड पूर्व मुंबई

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