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खण्डहरों में घर बसाना ही तो ज़िंदगी है….

ज़िंदगी सिर्फ आसान रास्तों का नाम नहीं है। असली ज़िंदगी तो तब शुरू होती है जब इंसान खंडहरों में भी एक घर बसाने का हौसला रखता है। जब आंसुओं के बीच भी मुस्कुराना न छोड़े, और जब नामुमकिन लगने वाले हालातों को मुमकिन बना देने का साहस दिखाए। मौसम बदलते रहेंगे, कभी उजाले होंगे तो कभी शामें भी उतरेंगी। लेकिन जो इंसान मुश्किलों से डरे नहीं, उन्हें अपना गुरु माने, वही बुलंदियों को छू पाता है। अंधेरे आते हैं, अमावस भी होती है, पर उसी के बीच से चांदनी भी निकलती है — जो इस सच्चाई को समझ ले, वही सच्चे अर्थों में जीना जानता है।

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हौसले की लौ…

यह कविता आत्मबल, साहस और जीवन संघर्षों के बावजूद आगे बढ़ते रहने की एक सशक्त अभिव्यक्ति है। इसमें कवि अपने जीवन की यात्रा को एक पर्वतारोहण की तरह प्रस्तुत करता है, जहां रास्ता कठिन है, पर मंज़िल की चाह अडिग है।

प्रारंभिक पंक्तियाँ प्रेरणादायक हैं — आँधियों और तूफानों को भी मात देने वाले उस ‘हौसले के दिए’ की बात होती है, जो अंधेरे में भी मार्ग दिखाता है। इसके बाद कविता सपनों की उड़ान की बात करती है, और बताती है कि थकना, रुकना या पीछे हटना विकल्प नहीं है।

यह एक ऐसा जोश भरा गीत है, जो संघर्षों को गीतों में पिरोकर उन्हें प्रेरणा में बदल देता है। वक्त ने चाहे कितनी भी सख्ती दिखाई हो, लेकिन वक्त ही नई रोशनी भी लाएगा — इस उम्मीद को कवि ने ‘नूर’ और ‘दीप’ जैसे प्रतीकों से दर्शाया है।

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