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खण्डहरों में घर बसाना ही तो ज़िंदगी है….

ज़िंदगी सिर्फ आसान रास्तों का नाम नहीं है। असली ज़िंदगी तो तब शुरू होती है जब इंसान खंडहरों में भी एक घर बसाने का हौसला रखता है। जब आंसुओं के बीच भी मुस्कुराना न छोड़े, और जब नामुमकिन लगने वाले हालातों को मुमकिन बना देने का साहस दिखाए। मौसम बदलते रहेंगे, कभी उजाले होंगे तो कभी शामें भी उतरेंगी। लेकिन जो इंसान मुश्किलों से डरे नहीं, उन्हें अपना गुरु माने, वही बुलंदियों को छू पाता है। अंधेरे आते हैं, अमावस भी होती है, पर उसी के बीच से चांदनी भी निकलती है — जो इस सच्चाई को समझ ले, वही सच्चे अर्थों में जीना जानता है।

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