समरस समाज

विभिन्न वर्गों के लोग एक साथ खड़े, समानता और एकता का प्रतीक

दीप्ति अग्रवाल दीप, नई दिल्ली

व्यवहारिकता का समाज में,
मानवता ही हो आधार।
भेद-भाव जड़ से मिट जाए,
वंचित भी पाये अधिकार।।

एक समान रचा ईश्वर ने,
मन से भेद-भाव को छोड़।
जाति नहीं गुण क्षमता देखो,
कुरीतियों की बेड़ी तोड़।।
स्वार्थ-भाव जो गढ़ी प्रथाएँ,
आज माँगती पूर्ण सुधार।
भेद-भाव जड़ से मिट जाए,
वंचित भी पाये अधिकार।।

घर-घर हो बुनियादी सुविधा,
शहरी हो या हो ग्रामीण।
पेट भरे भोजन से सबका,
कोई भूखे रहे न क्षीण।।
कभी किसी को हेय न समझें,
प्रेम भाव से हो व्यवहार।
भेद-भाव जड़ से मिट जाए,
वंचित भी पाये अधिकार।।

मिल-जुल कर आगे बढ़ने से,
विकसित होगा अपना देश।
सम अवसर पाकर प्रतिभाएँ,
होंगीं नव सोपान प्रवेश।।
विश्व समूचा माने लोहा,
शीघ्र स्वप्न होगा साकार।
भेद-भाव जड़ से मिट जाए,
वंचित भी पाये अधिकार।।

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