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आत्मविश्वास से खड़ा व्यक्ति, चुनौतियों के बीच सफलता की ओर बढ़ता हुआ

“जिद से पहचान”

बदनाम से पहचान तक” एक गहरी भावनात्मक हिंदी ग़ज़ल है, जो इंसान के संघर्ष, आत्मसम्मान और समाज की बदलती सोच को दर्शाती है। यह ग़ज़ल बताती है कि जीवन में बदनामी या असफलता अंत नहीं होती, बल्कि वही हमारे लिए एक नई पहचान बनाने का अवसर बनती है। आज के दौर में जब लोग अक्सर दूसरों के बारे में जल्दी राय बना लेते हैं, यह रचना हमें धैर्य, मेहनत और आत्मविश्वास का महत्व सिखाती है।

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छोटे किराए के कमरे में खड़ी एक युवती, टूटी-फूटी व्यवस्था के बीच अपने नए जीवन की शुरुआत करती हुई

जीने के लिये

यह कहानी एक युवती की है, जो सपनों के साथ दिल्ली आती है, लेकिन पहले ही दिन उसे कठिन वास्तविकताओं का सामना करना पड़ता है। खराब कमरे और असहयोगी माहौल के बावजूद वह हार नहीं मानती। अपने आत्मविश्वास और जज़्बे से वह हालात को बदल देती है। यह कहानी हर उस व्यक्ति को प्रेरित करती है, जो जीवन में संघर्षों के बीच भी आगे बढ़ना चाहता है।

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कठिन पहाड़ी रास्ते पर आगे बढ़ता यात्री, संघर्ष और संकल्प का प्रतीक

चलता चल राही

चलता चल राही” एक प्रेरणादायक कविता है, जो बताती है कि जीवन की राह में कांटे, बाधाएँ और संघर्ष आएँगे, लेकिन रुकना नहीं बस चलते रहना ही विजय का मार्ग है।

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अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर लौटता हुआ जनसमूह, तनी हुई मुट्ठियाँ और संघर्ष का प्रतीकात्मक दृश्य।

वे लौटेंगे..

“वे लौटेंगे” एक प्रभावशाली कविता है जो बिखरे हुए लोगों के फिर से संगठित होकर अन्याय के खिलाफ खड़े होने की उम्मीद को स्वर देती है। यह रचना संघर्ष, एकता और मानवता के बीज बोने की बात करती है। कविता बताती है कि जो लोग दिशाओं में बिखर गए हैं, वे एक दिन फिर लौटेंगे भूख, पीड़ा और अन्याय को मुट्ठी में भींचकर, एक स्वर और एक आवाज़ बनकर।

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सूरज रे तू बढ़ता चल

सूरज रे तू बढ़ता चल” एक प्रेरणादायक कविता है जो अंधकार, थकान और कठिन परिस्थितियों के बीच निरंतर आगे बढ़ते रहने का संदेश देती है। सूरज यहाँ केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि साहस, उम्मीद और उजाले का प्रतीक बनकर उभरता है।

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बेटे का इंतजार करती मां की भावुक और प्यार भरी यादें –

जिसने अक्षर नहीं, जीवन पढ़ाः मेरी मां

बाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर जीवन की भाषा उन्हें पूरी तरह आती थी। बचपन की जिम्मेदारियों ने उन्हें समय से पहले माँ बना दिया। स्वाभिमान उनकी साँसों में था और ममता उनके कर्मों में। टूटकर भी न बिखरने वाली इस स्त्री ने चुपचाप पूरा घर थामे रखा और अंत में, हरी रेखाओं के बीच, अपने होने का आख़िरी संकेत दे गई।

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काँच नहीं, अब धार हूँ

कभी किसी दिन जीवन की भाग-दौड़ से पल चुराकर मैं अपनी ही बनाई शांति में बैठूँगी। फूलों, पेड़ों और परिंदों की चहचहाहट के बीच मैं खुद को सुनूँगी और तब समझ आएगा कि सबसे बड़ा सहारा मैं स्वयं रही हूँ। टूटकर भी जिसने खुद को समेटा, वही मेरी असली पहचान है।

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यह घर बहुत हसीन है

मेरी ज़िंदगी एक जगह से शुरू नहीं हुई।
वह एक किराए के मकान से दूसरे तक भटकती रही। यह घर सिर्फ़ ईंट और सीमेंट से नहीं बना, इसमें हमारे डर, संघर्ष और सपने बसे हैं। इसीलिए यह साधारण-सा घर मेरे लिए बहुत हसीन है।

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