“कंधों पर दुनिया, आँखों में समंदर”
पुरुष ज़ुबां से कम बोलते हैं, पर उनकी आँखें सब कह देती हैं. प्यार, फ़िक्र, थकान और छुपी हुई नमी। ज़िम्मेदारियों में दबे हुए भी वे घर की जड़ बनकर सबकी खुशी में खुद को भूल जाते हैं।

पुरुष ज़ुबां से कम बोलते हैं, पर उनकी आँखें सब कह देती हैं. प्यार, फ़िक्र, थकान और छुपी हुई नमी। ज़िम्मेदारियों में दबे हुए भी वे घर की जड़ बनकर सबकी खुशी में खुद को भूल जाते हैं।
अपने माता-पिता को आग में खोने के बाद अरुण बिल्कुल अकेला रह गया। एक साड़ी की दुकान में काम करते हुए उसने चोरी रोककर अपने मालिक का विश्वास जीत लिया। मालिक ने उसकी ईमानदारी देखकर उसे अपनी बेटी निशा के साथ विवाह के लिए कहा। किस्मत से उजड़ा अरुण का घर फिर से बस गया, और तीनों एक खुशहाल परिवार बन गए।
जीवन की आंधियाँ जब चलती हैं, तो सिर्फ डालियाँ ही नहीं, कई बार इंसान भी टूट जाते हैं . अपने ही सदाचार और शुभ कर्मों के बोझ से। इस टूटने में भी एक सच्चाई है जैसे परिंदों के घोंसले बिखर जाते हैं, पर वे नई जगह फिर से घर बना लेते हैं। कोयल की तान कहीं खो जाती है, मगर उसकी खोज जारी रहती है। यही जीवन का शाश्वत चक्र है . गिरना, बिखरना और फिर उठना।
शादी के 25 वर्ष बीत गए समय कैसे गुजरा पता ही नहीं चला । अपने परिवार की मर्जी के विरुद्ध किसी लड़के का हाथ थाम कर अपने जीवन सफर पर निकल जाना मेरे लिए कांटों से भरा रास्ता था , पर चुनाव मेरा था और कांटे मिले या फूल यह मेरी किस्मत. समय बदला उनकी ना धीरे-धीरे हां में बदलने लगी
वक्त ने हमसे कई अपने छीन लिए, वरना हमारा कारवां भी कभी बड़ा हुआ करता था। हमने भी कभी रेत पर सपनों के रंगों से शब्द लिखे थे, पर लहरों का जोर इतना था कि सब मिट गया। भयानक आंधियों में भी आसमान तो ठहरा रहा, मगर पंछियों की चोंच खाली थी। जिसे अपने हुनर पर पूरा भरोसा था, वही शहर की बिगड़ी हवा में गुम हो गया। जिस पेड़ ने जिंदगी भर छाँव दी, उसी पेड़ से उसने रिश्ता तोड़ लिया। जो हमेशा दूसरों की थालियाँ भरता रहा, आज उसकी अपनी थाली खाली है। अब उसने आसमान की फिक्र छोड़ दी है . बस ज़मीन को सिर पर उठाकर आगे बढ़ना सीख लिया है।
कहानी राधिया नाम की झुग्गी बस्ती में रहने वाली एक स्त्री की है, जो एक समाजसेवी “मैडम जी” से मिलकर नई उम्मीदों से भर जाती है। उसे लगता है कि अब उसका जीवन बदल जाएगा . उसे नौकरी मिलेगी, सम्मान मिलेगा, और अपने बच्चों को शिक्षित कर सकेगी। पर जब वह काम के लिए मैडम जी के घर पहुँचती है, तो देखती है कि वही “मैडम जी” अपने पति के अत्याचार का शिकार हैं। यह दृश्य राधिया की सारी कल्पनाओं को तोड़ देता है। उसे एहसास होता है कि औरत चाहे अमीर हो या गरीब, उसके दर्द और संघर्ष एक जैसे हैं।
**Blurb:**
कहानी *“रेस”* आधुनिक प्रकाशन जगत की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है जहाँ प्रतिभा नहीं, नाम बिकता है। एक साधारण लेखिका की शानदार कहानी केवल इसलिए अस्वीकृत कर दी जाती है क्योंकि उसके पास कोई पहचान नहीं। संपादक के लिए रचनाएँ नहीं, “ब्रांड” मायने रखते हैं। सहायक आलोक के भीतर उठता द्वंद्व और अंत में उसकी मजबूर चुप्पी – यही इस कहानी का दर्द है। यह सिर्फ एक दफ्तर का दृश्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की झलक है जहाँ शब्दों की जगह प्रसिद्धि का शोर गूँजता है।
कविता में दरिया को जीवन के संघर्ष और पवित्रता का प्रतीक बनाया गया है। दरिया मस्ती और ऊर्जा के साथ बढ़ती है, अपने रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं को पार करती है, किनारों से संबंध बनाए रखती है और दूसरों के कष्ट और पापों को समेटती है। यह अपने गंतव्य की ओर दृढ़ता और गति से बढ़ती है, अंततः समुद्र की विशाल बाहों में विलीन होकर अपने सफर का निष्कर्ष प्राप्त करती है। यह कविता दर्शाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएँ आएँ, संयम, धैर्य और अपने मूल्यों के साथ मार्ग पर बढ़ते रहना ही सफलता की कुंजी है।
ज़िंदगी के ज़ख्मों में भी मुस्कुराना हमने सीख लिया है. अपनों के दिए हुए ज़हर के घूंट को पीकर भी अब हमें जीने की आदत हो गई है. हमने हंसी में अपने दर्द को छिपाना और दिल में ग़मों को दबाना सीख लिया है. अपनों के धोखे और वार से खुद को संभालना और दूसरों का हमदर्द बनकर उनके ज़ख्मों पर मरहम लगाना भी आ गया है. घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर जब हमने सांस ली, तब दुनिया की मक्कारी और चालें पढ़ना सीख लिया. इस काँटों से भरी बस्ती में रहकर भी हमने दूसरों तक खुशबू पहुँचाना सीख लिया. हमें अब यह भी समझ आ गया है कि मां-बाप के सिवा कोई सच्चा हितैषी नहीं होता, इसलिए दुनिया से थोड़ा किनारा करना भी हमने सीख लिया है.
कीचड़ और झंझटों से भरी इस दुनिया में रहते हुए हमने खुद को ईश्वर भक्ति में चमकाना सीख लिया है. अब दर्द भी हमें डराता नहीं, क्योंकि हमने सचमुच “जीना” सीख लिया है.