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ग़ज़ल 

जब दिल के मचलते भाव किसी अक्षर को ढूँढ लेते हैं, तो उन्हें बयान करने का अंदाज़ भी खोज लिया जाता है। जिन्हें उड़ने की चाहत होती है, वे पर ढूँढ लेते हैं और ज़मीन पर रहते हुए भी अपना आसमान पा लेते हैं। बच्चे बिना समझे पराए के अंतर को भी पहचान लेते हैं। उन्हें कमजोर करना आसान नहीं होता, क्योंकि अँधेरे में भी वे अपने मार्ग को प्रकाशमान बना लेते हैं। जो अपनी किस्मत खुद लिखते हैं, उन्हें अपने प्रयास पर विश्वास होता है और अवसर अपने आप ढूँढ लेते हैं। जिनके लिए मकान पक्का हो या न हो, वे सियासत के ज्वलनशील शोले भी पार कर लेते हैं। यह शरीर मिट्टी का बना है और मिट्टी में ही लौटना है, फिर भी वे अपनी आत्मा के दूसरे रूप को खोज लेते हैं। जब तक साँस चलती है, अर्चना को भी फुर्सत नहीं होती, फिर भी कुछ पल के लिए सुकून पा लेते हैं।

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जीवन एक संघर्ष है…

जीवन एक संघर्ष है” में जीवन की कठिनाइयों और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच संघर्ष की अनिवार्यता को व्यक्त किया गया है। लेखक बताते हैं कि केवल साँस लेना जीवन नहीं है; जीवन का सार संघर्ष, जिजीविषा और प्रकृति के साथ सामंजस्य में है। प्रेम, सौंदर्य, आनंद, विरह और मिलन—सबका संतुलन संघर्ष के माध्यम से ही मिलता है। यह कविता यह संदेश देती है कि अतीत, वर्तमान और भविष्य—सभी में संघर्ष ही जीवन की असली कहानी है। जीत और हार से परे, संघर्ष ही हमें सशक्त बनाता है और जीवन को सार्थक बनाता है।

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मैं कैसे हार मान लूं…

यह प्रेरणादायक लेख ज़िंदगी के संघर्षों और कठिनाइयों के बीच उम्मीद और दृढ़ता का संदेश देता है। लेखक बताती हैं कि हर ठोकर, हर असफलता और हर कठिन समय हमें मजबूत बनाता है। हार मानना केवल सपनों और उम्मीदों को छोड़ देना है। जीवन की जीत सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि हमारे परिवार, समाज और सपनों की जीत है। यह रचना हमें याद दिलाती है कि जब तक साँस है, तब तक उम्मीद है, और हमारे दिल की आवाज़ हमेशा यही कहती है—“मैं कैसे हार मान लूं?”

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मुश्किल है…

यह पाठ जीवन की कठिनाइयों और नैतिक संघर्षों का दर्पण है। यह बताता है कि सही और अच्छा बने रहना जितना सुनने में आसान लगता है, वास्तविकता में उतना ही कठिन है। चाहे परिवार और अपनों के साथ संबंध हों या समाज की अपेक्षाएँ, हमेशा सत्य और अच्छाई के मार्ग पर चलना चुनौतीपूर्ण होता है। लेखक अपने भीतर और बाहरी दुनिया में छिपे संघर्षों को उजागर करता है—अपने अंदर के रावण को पहचानना और उसे नियंत्रित करना, सही और गलत के बीच अंतर समझना, और स्वार्थी दुनिया में सच्चे और अच्छे लोगों की तलाश करना। यह न केवल व्यक्तिगत जुझारूपन का वर्णन है, बल्कि समाज और मनुष्य के अंतर्मन की जटिलताओं की भी गहरी झलक देता है।

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विरह की चुप्पी…

विरह की चुप्पी केवल एक स्त्री की कहानी नहीं है, बल्कि जीवन की गहराई का रूपक है। ऊँचे टीले पर बैठी नायिका सादगी और मासूमियत की प्रतिमा है—उसकी आँखों में टूटी हुई आकांक्षाएँ और मौन में दबे सपने हैं। उसके पास खड़ा सूखा वृक्ष, जैसे उसके मन के उजड़े आँगन का साक्षी हो। और उसी वृक्ष की डाली पर बैठी अकेली चिड़िया, उसकी पीड़ा को गीत में बदल देती है।

पवन उससे प्रश्न करता है—“किसका नाम लिए खोई हो?” लेकिन उत्तर शब्दों में नहीं, आँसुओं में टपकता है। यह मौन, यह अधूरापन, उसी विरह का संगीत है।फिर भी यह कविता केवल दुख का चित्र नहीं है। चिड़िया की तान हमें बताती है कि हर पतझड़ के पीछे छुपी होती है नयी हरियाली, हर सूखेपन के पार होती है नवजीवन की आहट।

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हस्‍तरेखा

मां के बहुत कहने पर उसने बाबा के सामने हथेली फैलाई। बाबा ने ध्यान से रेखाएँ देखीं और मुस्कराए
“अरे वा! बहुत सुंदर रेखाएँ हैं बिटिया, खूब सुख-संपत्ति और अच्छा पति मिलेगा।” वह अचानक बीच में बोल उठी—“विद्या की रेखा कहाँ है मेरे हाथ में, बताइए तो ज़रा?”बाबा ठिठक गए।“बिटिया, तुम्हारे नसीब में सब कुछ है, विद्या को छोड़कर।”उसकी आँखों में चमक आ गई।

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मैं सच को बयां करती हूं

डॉ.नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध साहित्यकार, उज्जैन मैं सच को बयां करती हूंअंगारों पर चलती हूंमैं गीत नए रचती हूंख्वाब नए चुनती हूं गहन तम को चीरकरअरुणिमा जगाती हूंटूटकर बिखरती हूंखुद को पिरो लेती हूं सूरज से आग लिएदीपक से राग लिएधरती का हरितस्वप्नआंचल में सजाती हूं कांटो की पृष्ठ परफूलों की कलम सेवसंत की आस लिएपतझड़…

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टूटता मानव…

मनुष्य आज अपने ही भीतर टूट रहा है। बिना वजह झगड़े पर आमादा है, जबकि जीने की जद्दोजहद पहले से ही कठिन है। कोई शराब और सिगरेट जैसे नशों में डूबा है, कोई जीवन की खुशियाँ खोकर केवल मरने की प्रतीक्षा कर रहा है।

वह अपने दिल में सिर्फ़ दर्द सँजोए बैठा है और खुद को ही ठुकराता जा रहा है। प्यार के रिश्तों में भी उसे छलावा और धोखा मिलता है, जिससे वह गुनहगार-सा महसूस करता है। समाज में झूठ और धोखे का बोलबाला है, सच्चाई का कोई रखवाला नहीं। ऐसे में आदमी सिर्फ़ होशियार होना सीख गया है, संवेदनाएँ खो बैठा है और संघर्षों में हारकर रोने पर मजबूर है।

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त्योहार पर घर

घर जाने का नाम आते ही उसके भीतर एक अजीब-सा डर जाग उठता है। डर किसी अनजान रास्ते का नहीं, बल्कि एक बहुत परिचित सवाल का है—
“क्या करते हो आजकल?”यही सवाल उसकी हिम्मत तोड़ देता है। यही वजह है कि वह एक और त्योहार भी अपने छोटे से कमरे में बिताने को मजबूर हो जाता है।उसके चारों ओर बिखरी रहती हैं कुछ पुरानी किताबें, कुछ बर्तन, मेज़ पर रखा टेबल लैंप और कोनों में धुंधले पड़ते सपनों की परछाइयाँ। इन्हीं सबके बीच वह सोचता है कि क्या उसे एक और साल की मोहलत खुद को देनी चाहिए या फिर चुपचाप उन सपनों को यहीं छोड़ देना चाहिए।

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भोर की प्रतीक्षा…

जाने कितने जंगलों को पार करती उसकी साँसें मेरे कानों से टकराई थीं। जैसे उसकी डूबती साँसें मुझे पुकार रही हों। मैं और मेरी साँसें उस निराकार ब्रह्मांड के शरणागत थे।एक कवियित्री की आँखों में खारे अश्क़ों की गहरी तरलता भरी थी। उन अश्क़ों ने मानो किसी देव के चरण पखारने की ठान ली थी। विशालकाय, हहराती गंगा में मेरे चंद खारे आँसू भी प्रार्थना में लीन थे।

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