ग़ज़ल 

अर्चना वर्मा सिंह, प्रसिद्ध कवयित्री मुंबई

मचलते भाव दिल के जब भी अक्षर ढूँढ लेते हैं

तो अंदाज़ ए बयां क्या हो सुखनवर ढूँढ लेते हैं।

जिन्हें उड़ने की चाहत हो तो वो पर ढूँढ लेते हैं 

ज़मीं पर रह के भी अपना वो अंबर ढूँढ लेते हैं। 

समझ अपने पराए की नहीं मालूम है फिर भी 

न जाने बच्चे कैसे फिर भी अंतर ढूँढ लेते हैं। 

उन्हें कमज़ोर कर देना कहाँ आसान होता है

अँधेरे में भी जो राह ए मुनव्वर ढूँढ लेते हैं। 

जो क़िस्मत खुद ही लिखते हैं लकीरें चाहते हैं कब

वो करते हैं यक़ीं खुद पर सो अवसर ढूँढ लेते हैं।

नहीं पड़ता उन्हें कुछ फ़र्क पक्के हो मकाँ जिनके

सियासत के दहकते शोले छप्पर ढूँढ लेते हैं।

है मिट्टी की ही काया ये इसे मिट्टी ही होना है

ये फ़ानी जिस्म अपना दूजा पैकर ढूँढ लेते हैं।

चलेगी साँस जब तक ‘अर्चना’ फ़ुर्सत कहाँ होगी 

चलो कुछ तो सुकूँ इसमें ही पल भर ढूँढ लेते हैं।

5 thoughts on “ग़ज़ल 

    1. बहुत अर्थपूर्ण गज़ल
      बधाई

      जो क़िस्मत खुद ही लिखते हैं लकीरें चाहते हैं कब

      वो करते हैं यक़ीं खुद पर सो अवसर ढूँढ लेते हैं।
      आपको बहुत-बहुत शुभ कामनाएं
      अर्चना वर्मा सिंह जी

      1. एक निवेदन
        रचनाओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद, यह अवश्य हमारे साथियों का उत्साहवर्धन करेगी और नवसृजन के लिए प्रेरित करेगी. बस एक छोटा सा निवेदन है आप सभी से कि आप अपने शहर का भी उल्लेख कर देंगे तो हमें और हमारे साथियों को लगेगा की उनकी रचनाएं कहां-कहां तक पढ़ी जा रही है.
        आपका साथी

    2. एक निवेदन
      रचनाओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद, यह अवश्य हमारे साथियों का उत्साहवर्धन करेगी और नवसृजन के लिए प्रेरित करेगी. बस एक छोटा सा निवेदन है आप सभी से कि आप अपने शहर का भी उल्लेख कर देंगे तो हमें और हमारे साथियों को लगेगा की उनकी रचनाएं कहां-कहां तक पढ़ी जा रही है.
      आपका साथी

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