कमलसिंह का ठेलाः यादों की पीली दोपहरें

गांव से बड़े स्कूल में आना नया अनुभव था जेब में रोज़ के सिर्फ़ दस पैसे, और आधे इंटरवल में कमलसिंह बापू के ठेले से पाँच पैसे के दो केले ही हमारा भोजन। वही ठेला छात्रों की राजनीति का अड्डा था, जहाँ बापू कभी रावण, कभी विदूषक तो कभी किंगमेकर बनकर चमकते। उधार की सीमा पच्चीस पैसे तक थी, पर मुस्कुराकर केले थमा देने वाला उनका अपनापन आज भी स्मृति में ताज़ा है. छोटे दिनों की बड़ी गर्माहट जैसा।

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सागर सा वजूद

समुद्र की तरह व्यापक है हमारा वजूद, बस ज़रूरत है उसमें छिपे मोतियों को पहचानने की। जिसकी तलाश में हम दुनिया भर भटकते हैं, वह ख़ुद हमारे भीतर ही छिपा होता है सुकून भी, ख़ुदा भी। भटकते-भागते जीवन में कभी-कभी घर लौटकर देखना चाहिए, शायद वही ठहराव का असली स्थान हो। मन उदास हो तो आकाश की तरफ देखो—वही विशालता दिल को हल्का कर देती है। हार से पहले हार मत मानो; अवसर लौट-लौट कर आते हैं।

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खुशी

“खुशी की सबसे बड़ी बाधा अक्सर हम खुद होते हैं। जो बातें हमारे नियंत्रण में नहीं, उन पर सोचते रहने से नकारात्मकता हमें घेर लेती है। दिनचर्या में थोड़ा बदलाव, मनपसंद काम के लिए समय और परोपकार यही आत्मा की सबसे सच्ची खुशी है।”

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मध्य रेल ने ‘ट्रेन ऑन डिमांड’ सेवाएँ शुरू कीं

– त्योहारों, ग्रीष्म व शीतकालीन अवकाश के दौरान यात्रियों की बढ़ती मांग को देखते हुए मध्य रेल ने विभिन्न प्रमुख गंतव्यों के लिए “ट्रेन ऑन डिमांड” विशेष ट्रेनों का संचालन शुरू कर दिया है। इन ट्रेनों को यात्रियों की सुविधा को प्राथमिकता देते हुए नागपुर, मडगाँव, बेंगलुरु, हजरत निजामुद्दीन, हैदराबाद, गोरखपुर, हावड़ा, सियालदह और बिलासपुर जैसे शहरों के बीच चलाया जा रहा है, जिससे राज्यों के बीच तेज़, आरामदायक और निर्बाध यात्रा सुनिश्चित हो सके।

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महिदपुर रोड का पहला जलसा: चटर्जी नाइट

साल 1980 का महिदपुर रोड, गलियों में हलचल थी और हर कोई पहले बड़े जलसे “चटर्जी नाइट” की तैयारियों में व्यस्त। यह जलसा प्रिय शिक्षक स्व. कपूर साहब की स्मृति में आयोजित किया गया था। मंच की कमी के बावजूद विद्यार्थियों ने खाली ड्रम और लकड़ी के स्लीपर से एक शानदार मंच तैयार किया। जब प्रभात चटर्जी और उनका आर्केस्ट्रा मंच पर आए, तालियों और उत्साह की गूँज में पूरा महिदपुर रोड मंत्रमुग्ध हो गया। यह केवल संगीत का आयोजन नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और जुनून की मिसाल बन गया।

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वह अफ़साना…

अश्विन सर, मुझे लेकर, कहां जा रहे हैं ? और क्यों ? छोटा शहर है, किसी ने मुझे इनके साथ देख लिया तो न जाने मेरे बारे में क्या सोचेगा ।
सर, ने मुझे एक एंप्लॉय से ज्यादा दोस्त समझा, मुझ पर विश्वास किया, और अपनी कुछ ऐसी बातें शेयर की जो वह शायद किसी और से कह नहीं सकते थे….. लेकिन उन्होंने जो कहा उसे सुनकर मैं सकते में आ गई …….. दोस्त समझा तो सही सलाह देना मेरा फर्ज था

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फुगी, नवी और मैं

वी घाव चाटकर बिल्ली को ठीक करती है, कबूतर के मरने पर रोती है, और हर जीव को अपनाने की अद्भुत ताकत रखती है। कभी-कभी लगता है वह बोल नहीं सकती, पर सुनना, समझना और प्रेम बाँटना उसे हम इंसानों से कहीं बेहतर आता है।

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महिदपुर रोड: प्यार, सहयोग और परंपरा की धरती

महिदपुर रोड एक ऐसी जगह है जहाँ सेवा और अपनापन हर घर में बसा है। रात के अंधेरे में भी किसी की तबीयत बिगड़े तो सौभाग दादा का ट्रक हमेशा एंबुलेंस की तरह तैयार रहता था। यहाँ हर मुस्कान, हर रिश्ते में परंपरा और निस्वार्थ सेवा की गंध महसूस होती है।

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सावन, राखी और एक खाली दहलीज़

हर बेटी के लिए मायका सिर्फ़ घर नहीं, सांसों की मिट्टी होता है।पर कुछ बेटियों के हिस्से वो आँगन नहीं आता, जहां राखी, सावन और तीज मुस्कुराते थे। उनके त्योहार भी सादे, आंखें भीगी, और दिल भीतर से थोड़ा रिक्त रहता है…

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रील्स की चमक में खो गई वो पुरानी शादी

कभी शादियाँ सिर्फ दो लोगों का नहीं, पूरे मोहल्ले का उत्सव हुआ करती थीं। ढोलक की थाप पर गाए जाने वाले बन्ने-बन्नी के गीत, बुआ-मौसी की हंसी, आँगन में उबलती खीर . सब जैसे आज भी स्मृतियों में ताजे हैं। पर अब शादी की रस्में कैमरे की फ्रेमिंग में बंध गई हैं, और भावनाएँ फिल्टरों के नीचे धुंधली।

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