कविता, ग़ज़ल और एहसासों का उत्सव

मुंबई के गोरेगांव स्थित मृणालताई हॉल में चित्र नगरी संवाद मंच द्वारा साहित्य, संगीत और संवेदना से सजी एक मनभावन शाम आयोजित हुई। सकारात्मकता-नकारात्मकता पर रोचक चर्चा, कालजयी कविताओं का पाठ, ग़ज़लों की महक और पुस्तक विमोचन ने इस कार्यक्रम को खास बना दिया। साहित्यकारों, कलाकारों और श्रोताओं की दमदार मौजूदगी ने पूरे माहौल को जीवित और अर्थपूर्ण बनाया।

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…जब कपड़ा लंबा-सिलता था और बचपन भी

आलमारी खोली तो कपड़े बहुत थे, पर एक भी प्रेस किया हुआ नहीं। कपड़ों का ढेर देखते ही बाबूजी याद आ गए जब साल में बस दो बार नए कपड़े सिलते थे। बसंती दा से उधारी में कपड़ा लेना, टेलर की दुकानों के चक्कर, “थोड़ो लंबो-जंबो सिलजो, बच्चा बढ़ रहा है” की आवाज़, और नए कपड़ों के इंतज़ार का उत्साह… आज भले मॉल में पहनकर घर आ जाएं, पर वो इंतज़ार, वो खुशी, अब कहीं नहीं मिलती।

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शांतता… पुणेकर वाचत आहेत

पुणे शहर और पिंपरी-चिंचवड़ मंगलवार, ९ दिसंबर को एक ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने जा रहे हैं्. पुणे पुस्तक महोत्सव २०२५ के अंतर्गत आयोजित विशेष उपक्रम ‘शांतता… पुणेकर वाचत आहेत’ में आज सुबह ११ से १२ बजे के बीच पूरा शहर एक साथ पुस्तक पढ़ने के अनोखे प्रयोग में सहभागी होने वाला है. इस एक घंटे के वाचन समारोह के माध्यम से पुणे विश्‍व रिकार्ड बनाने की दिशा में कदम बढ़ाएगा.

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बंदर के हाथ में उस्तरा !

विधानसभा में विपक्ष के विरोध का फैंसी ड्रेस शो जारी रहा। कांग्रेस विधायकों ने ‘बंदर के हाथ में उस्तरा’ थीम पर प्रदर्शन किया। छिंदवाड़ा जिले के जुन्नारदेव से कांग्रेस विधायक सुनील उइके बंदर बनकर आए थे। उनके हाथ में सांकेतिक उस्तरा भी था। कांग्रेस ने इस प्रदर्शन के जरिए आरोप लगाया कि भाजपा सरकार उस बंदर की तरह काम कर रही है, जिसके हाथ में उस्तरा है

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बाबूजी की हाथ घड़ी

मेरे पिताजी एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक थे, जिनकी तनख्वाह कम थी, लेकिन आत्मसम्मान और ज्ञान कूट-कूट कर भरा था। साल 1974 में उनके तबादले के समय, घर का सारा खर्च उधारी पर चलता था। घर का सामान बैलगाड़ी में शिफ्ट करना था, लेकिन पिताजी ने सबसे पहले 60 रुपए का उधार चुकाया। इसके लिए उन्होंने अपनी प्रिय सुनहरे डायल वाली हैनरी सैंडो घड़ी बेच दी।

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कभी-कभी गलतफ़हमी

कभी-कभी हमें भ्रम हो जाता है कि सामने वाला सच में प्यार करता है उसकी बातों में अपनापन दिखता है, इकरार के लम्हे भी सच्चे लगते हैं। वह गले लगकर समझने का दावा तो करता है, पर दुनिया के सामने वही समझ कमज़ोर पड़ जाती है और हमारी नासमझी गिनाई जाती है। मन जैसा चाहे वैसा प्यार दे भी दे, और इल्ज़ामों की बरसात भी उसी मन से कर दे तब रिश्ते बोझ बनते देर नहीं लगती।

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शब्दों में संवेदना का दरवाज़ा :”मुझ में भी रहता है इकतारा”

डॉ. तारा गुप्ता द्वारा लिखित गज़ल संग्रह मुझ में भी रहता है इकतारा दिल और दिमाग के बीच बहते उस पुल की तरह है, जिस पर चलते हुए पाठक जीवन, संवेदना, अनुभव और दर्शन सभी को साथ लेकर आगे बढ़ता है. कुल 70 ग़ज़लें, 36 मुक्तक और 35 दोहे इस संग्रह को विविधता से भरते हैं और पाठक को एकरसता से दूर रखते हैं.

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प्रेम में…

प्रेम जब आया, तो स्त्री न केवल पत्नी रही, न प्रेयसी वह मां बन गई, धारण करने वाली, संभालने वाली। पुरुष भी न प्रेमी बन सका, न पूरा आदमी; वह तो जैसे शिशु हो गया, स्नेह और सहारे पर टिका हुआ। प्रेम ने पशु से भी पशुत्व छीन लिया और वह संत-सा शांत और सहज हो उठा। तब लगा, प्रेम कोई साधारण भाव नहीं यह क्रांति है,

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इंतज़ार

ज़िंदगी ने बस इतना ही सिखाया है कि इंतज़ार भी एक उम्र माँगता है। न जाने कितनी रातें, कितने दिन तेरी याद में गुज़र गए। खामोशी बहुत कुछ कहती है, पर जब दिल नहीं समझ पाता, मैं फ़िज़ाओं के बीच आकर तेरे दीदार की आस लगा बैठता हूँ। अब तो ये हवाएँ भी थकी-सी लगती हैं .मानो ये भी चाहती थीं कि एक दिन मेरी खामोशी मुस्कान में बदल जाए।

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कुछ अनकही …

सब ठीक है होने और सब ठीक है कहने में बहुत फर्क होता है। अक्सर हम हँसी के पीछे छिपी खामोशी नहीं पढ़ पाते। कोई पूछे“कैसे हो?” और हम सिर हिलाकर हाँ कह दें, तो समझिए, आधी पीड़ा वहीं मौन में कैद रह जाती है।

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