हे केशव, तेरी यह कैसी माया?

सर्वेश सावंत, मुंबई

हे केशव, तेरी यह कैसी माया?
आज अचानक रोम-रोम कृष्ण प्रेम से
पुलकित हो आया।

इतने दिनों नाम जपते थक-हारा,
चातक-सा तृष्णा में व्याकुल,
मैं बैठा राह लाचार-सा।

आज नाम के संग तनिक भाव का लवण मिलाया,
तो जैसे गरुड़, शेष, शंख-चक्र छोड़
भक्तवत्सल तू दौड़ा चला आया।

जब भक्ति-भाव की बूंदें बरसी
इस व्याकुल मन के आंगन में,
तो लगा मेरा मानव जन्म आज
सार्थक होने को तैयार हुआ।

अनगिनत क्रंदनों का
तूने आज उत्तर दे डाला।
सुर, किन्नर, नारद, संसार
देखता ही रह गया।

ऐसा अद्भुत कृष्ण प्रेम
मन-पात्र से उमड़
बह निकला आज।

हे मधुसूदन, बस एक विनती
यदि यह अनंत उपकार हो जाए,
तो श्रीकृष्ण सखा सदा साथ पाया।

हे केशव, तेरी यह कैसी माया?
आज अचानक रोम-रोम कृष्ण प्रेम से
पुलकित हो आया।

3 thoughts on “हे केशव, तेरी यह कैसी माया?

  1. केशव के प्रति इतनी भक्ति…
    आपकी अप्रतिम कविता के लिए बधाई 🙏

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