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हे केशव, तेरी यह कैसी माया?

कभी साधारण जप सा लगता कृष्ण-नाम आज अचानक मन में तरंग बनकर उठा। जैसे ही भाव की एक बूंद हृदय में गिरी, भीतर का सारा सूखापन हर गया। लगा मानो केशव स्वयं दया कर उपस्थित हो गए हों। बरसों की पुकार, प्रतीक्षा और तड़प का उत्तर आज मिला। रोम-रोम भक्ति से भीग उठा यही क्षण जन्म का सार्थक होना है।

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