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देश की धरा

उगते सूर्य के प्रकाश में भारत की धरा, सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक दृश्य

चौ. मदन मोहन समर, पूर्व पुलिस अधिकारी (भोपाल)

देश की धरा जरा से मुक्त निर्जरा है यह।
अथश्री से अक्षयी अनिंद्य निर्झरा है यह।

विज्ञ,भिज्ञ तत्व की ये बह्म के विधान की।
जानती है घट-घड़ी अनंत आसमान की।
त्रिकाल दर्शनी भविष्य भूत आज की कला।
त्वेष तमहरा अखंड ज्योतसना ये वत्सला।
कालखण्ड के विखण्ड को सहेज दृष्टि में।
देखती अशेष-शेष है विशेष सृष्टि में।
युगाब्ध से प्रदीप्त सूर्य की स्वयंवरा है यह।

पुण्य का प्रताप है ये पाप नाशिनी धरा।
देह में है प्राण की तरह प्रकाशिनी धरा।
श्वास-श्वास में सुगंध की तरह बसी धरा।
देश की प्रफुल्लता से खिलखिला हँसी धरा।
रश्मियों के रथ समूचे खोजते हैं यह धरा।
दिव्यता के पथ समूचे पूजते हैं यह धरा।
ययावरी यति रहित यती युगांतरा है यह।

हर विहान में हो व्यक्त यह धरा सशक्त है।
अस्थियां हैं इस धरा से यह धरा ही रक्त है।
दग्ध हो दिनेश शीश पर उबाल डाल दे।
प्रार्थना हो स्नेहसिक्त यह धरा सम्हाल ले।
सांझ का वितान श्रेष्ठ दे गमन की ओर हो।
रोम-रोम हो ऋणि कृतध्न पोर-पोर हो।
सुहासिनी सुवासिनी सुभाषिनी धरा है यह।

सूक्तीयां, ऋचाएं, मंत्र, श्लोक, सूत्र के चरण।
इस धरा को विद्वता के रिद्ध-सिद्ध व्याकरण।
आयनों के शोध, बोध भौतिकी कथायों के।
सत्य सामने रखे हैं वृक्ष कोशिकायों के।
इस धरा को दस दिशाएं ताकती रहीं सदा।
सभ्यताएं सर्वश्रेष्ठ आंकती रहीं सदा।
धैर्यवान धी मही शुभा ऋतम्भरा है यह।

समस्त को कुटुम्ब मान कर दुलारती रही।
सभी सुखी सभी प्रसन्न हों विचारती रही।
शक्ति के शिखर इसी के तापसी अरण्य हैं।
शस्य श्यामला की आरती उतार धन्य हैं।
मत मतान्तरों की मान्यता से मुक्त साध्य है।
इसीलिए मनीषियों की यह धरा आराध्य है।
स्वयंप्रभा शुभांकरा सुधा वसुंधरा है यह।

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