भारत में रोटी के लिए लाइन में खड़े अमीर और गरीब लोग, भूख और जीवन संघर्ष को दर्शाता भावुक यथार्थवादी दृश्य।

सब लोग तेरे दीवाने

“सब लोग तेरे दीवाने” एक संवेदनशील हिंदी कविता है, जो रोटी के महत्व और भूख की पीड़ा को गहराई से व्यक्त करती है। यह कविता बताती है कि अमीर हो या गरीब, हर इंसान की पहली जरूरत रोटी ही है। जीवन के संघर्ष, इच्छाओं और हालातों के बीच रोटी की तलाश कभी खत्म नहीं होती। कवि ने सरल शब्दों में समाज की वास्तविकता, गरीबी और मानवीय जरूरतों को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। यह कविता पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है कि रोटी केवल भोजन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।

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रामलीला में एक अप्रत्याशित हादसा

यह घटना 1987 की है, जब मैं पीलीभीत के बीसलपुर में उपजिलाधिकारी था। दशहरे मेले में रावण के दरबार में स्थानीय नर्तकियाँ—पतुरिया—नृत्य करती थीं। उस वर्ष पुलिस उपाधीक्षक ने इस नृत्य पर रोक लगा दी। दशहरे के दिन, रावण बने कलाकार ने मुझसे पानी मांगा जिसे मैंने तुरंत दिया। लेकिन कुछ ही देर बाद वही कलाकार अचेत हो गया और चिकित्सालय पहुँचने पर मृत घोषित कर दिया गया। रावण वध उस वर्ष नहीं हो सका और मेला एक त्रासदी में समाप्त हुआ।यह एक याद दिलाती घटना है कि रावण का वध चाहे पुतले से हो या रामलीला में निभाए गए किरदार से, मृत्यु अपरिहार्य होती है।

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वह सुबहें, वह होटल, वह जूनून

महिदपुर रोड की शंकर सेठ की होटल, और वहाँ डम्प होने वाले अखबार। बचपन का वह लड़का, जो फिल्मों के पोस्टर और शो टाइम्स जानने के लिए हर दिन सुबह निकल पड़ता।
पहले डर और हिचकिचाहट के साथ, धीरे-धीरे वह परिचितों में ढल गया—रामनिवास मंडोवरा काकाजी, कालू दा, चंद्रकांत जोशी। अखबारों के पन्नों में डूबते हुए उसका जुनून बन गया आदत, और फिर लत।शंकर सेठ की होटल सिर्फ एक जगह नहीं थी. वह वह मंच थी जहाँ बचपन की जिज्ञासा और सपने पत्रकारिता की दुनिया में बदलने लगे

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सूर्य को अर्घ्य देने से मिलते हैं स्वास्थ्य, यश और सफलता

सूर्य केवल प्रकाश और ऊर्जा का स्रोत नहीं है, बल्कि वह हमारे जीवन के स्वास्थ्य, सफलता, यश और राज्य पद का भी कारण है। नियमित रूप से सूर्य को अर्घ्य देने से न केवल नौ ग्रह अनुकूल होते हैं, बल्कि जीवन की बड़ी से बड़ी समस्याएं भी हल होती चली जाती हैं। जानिए सूर्य को अर्घ्य देने की सही विधि, विशेष उद्देश्य अनुसार उपाय और जरूरी सावधानियां।

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पश्चिम बंगाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री की कुर्सी के पास दृढ़ मुद्रा में खड़ी एक प्रभावशाली महिला नेता, चारों ओर मीडिया कैमरे, राजनीतिक झंडे और चुनावी माहौल दिखाई देता हुआ व्यंग्यात्मक दृश्य।

खूब लड़ी मर्दानी, झांसा वाली रानी..

बंगाल की राजनीति पर आधारित यह व्यंग्य सत्ता, हार-जीत, इस्तीफे और राजनीतिक नाटकों की विडंबना को हास्य और तंज के माध्यम से बेहद रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत करता है।

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उससे मिलना

बहुत समय बाद उससे मिलकर मन को एक अजीब सुकून मिला। मैं उसे याद करता था जब वह बहुत छोटी थी — बिल्कुल गुड़िया जैसी। अब वह शादी-शुदा है, पति और बच्चे हैं, और एक खुशहाल जीवन जी रही है। यह देखकर मेरे चेहरे पर स्वाभाविक हँसी खिल उठी।

इतनी सम्पन्नता के बावजूद उसकी फितरत नहीं बदली है। उसकी सम्मोहक और उन्मुक्त हँसी, अविश्वसनीय सरलता और निहायत शालीनता आज भी बरकरार है। मैं सोचता हूँ कि कैसे वह उन मर्यादाविहीन लोगों से निपटती होगी, जो हमारे बीच निशंक घूमते हैं। ऐसे लोग अपने बीच होने पर यह भरोसा दिलाते हैं कि दुनिया आज भी सुन्दर है। उनकी मौजूदगी यह अहसास कराती है कि अच्छाई और बुराई की सतत लड़ाई में अंततः कौन जीतेगा, यह सुनिश्चित है।

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बड़ा बैनजी श्यामलता शर्मा: एक युग का अंत

बड़ा बैनजी- श्यामलता शर्मा

महिदपुर रोड की 95 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षिका श्यामलता शर्मा, जिन्हें पूरा क्षेत्र “बड़ा बैनजी” के नाम से जानता था, अब हमारे बीच नहीं रहीं। बेटियों की शिक्षा के लिए उनका संघर्ष, उनका स्नेह और उनकी रोशन मुस्कान पीढ़ियों तक याद की जाएगी।

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एक रोमांटिक दृश्य जो प्रेम, एहसास और दिल की गहराई को दर्शाता है

सुनो साहिब…

“सुनो साहिब” एक कोमल और गहरी भावनाओं से भरी कविता है, जो प्रेम के उस एहसास को व्यक्त करती है जहाँ दो दिल धीरे-धीरे एक-दूसरे में समाने लगते हैं। यह रचना बताती है कि सच्चा प्रेम केवल शब्दों में नहीं, बल्कि हर सांस, हर धड़कन और हर ख्वाब में बस जाता है। जब मोहब्बत अपनी गहराई पर पहुँचती है, तो इंसान खुद को भी अपने प्रिय के भीतर खोजने लगता है। यह कविता समर्पण, अपनापन और आत्मीय जुड़ाव की खूबसूरत अभिव्यक्ति है।

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फिर से… सिर्फ अपने लिए

रेखा ने बचपन में जो कहानियाँ लिखना शुरू किया था, वो ज़िंदगी की दौड़ में कहीं खो गया था। लेकिन एक पुरानी सहेली की एक बात ने उसके भीतर की सोई हुई लेखिका को फिर जगा दिया। धूल भरी कॉपी, सूखे फूल, और अधूरी कहानियाँ — सब फिर से ज़िंदा हो उठे। कभी-कभी ज़िंदगी वहीं से शुरू होती है, जहाँ हमें लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया है।

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बचपन की दीवाली : यादों की मिठास

बचपन की दीवाली में हर चीज़ में मज़ा और उत्साह होता था—धूप में फूलते गद्दे, मम्मी-चाची का त्योहार नाश्ता, और पापा का हाथ का फ्रूट क्रीम। आज की सुविधाओं के बावजूद वह मासूमियत और उत्सुकता कहीं खो सी गई है, लेकिन यादें हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहती हैं।

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