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महंगाई से परेशान आम आदमी और बढ़ती कीमतों का प्रतीकात्मक दृश्य

बढ़ती महंगाई

यह कविता नारद जी और महंगाई के संवाद के माध्यम से समाज की विडंबना को उजागर करती है। महंगाई खुद को निर्दोष बताती है और असली जिम्मेदारी सत्ता और व्यवस्था पर डालती है जो इस व्यंग्य को और भी प्रभावशाली बनाता है।

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एक प्याली चाय… और पीछे छुपा पूरा असम

“भारत की आत्मा अगर विविधता है, तो उसकी सांसों में जो सुगंध बसी है वह है चाय की खुशबू। हर सुबह की शुरुआत, हर शाम की थकान, दोस्तों की हंसी और दफ्तर की भागदौड़—इन सबके बीच कहीं न कहीं असम की मिट्टी और मेहनत की खुशबू घुली होती है। असम की ब्रह्मपुत्र घाटी की उर्वर मिट्टी और मेहनती मजदूरों की तपस्या से निकली हर चाय की चुस्की सिर्फ स्वाद नहीं, एक संस्कृति, संघर्ष और सम्मान की दास्तान सुनाती है।”

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पत्थरों को तराशते-तराशते भावनाहीन हो गया एक शिल्पकार

ये मूर्तिकार

यह मूर्तिकार, जो छेनी-हथौड़ी से पत्थरों को तराशते-तराशते खुद भी एक पाषाण शिला सा बन गया है। उसके भीतर का प्रेम कहीं उसकी बनाई मूर्तियों में समा गया, या कहें कि बुत बनकर रह गया। कल जो प्रेम से लबालब था, आज वह भीतर से सूख चुका है—दरकती पपड़ी जैसा। समय की नश्वरता को समझते हुए भी उसने उसे नज़रअंदाज़ किया, क्योंकि उसके जीवन में अब बस औज़ारों का ही महत्व रह गया है। यही औज़ार उसके जीवनयापन का साधन हैं, उसकी भूख मिटाने का माध्यम हैं—उसका एकमात्र साथ।

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“खिड़की के पास बैठी भावुक महिला”

मेरी ख़ामोशियाँ पढ़ लो तुम

“मेरी ख़ामोशियाँ पढ़ लो तुम” एक बेहद भावनात्मक हिंदी कविता है, जो अनकहे जज़्बातों और रूहानी प्रेम की गहराई को खूबसूरती से व्यक्त करती है। यह कविता उन भावनाओं की कहानी है, जिन्हें शब्दों में कहना मुश्किल होता है, लेकिन दिल उन्हें गहराई से महसूस करता है।

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जीवनधारा कहानी में समाजसेविका युवती और उससे भावनात्मक रूप से जुड़ी महिला

जीवनधारा: बदनाम गली में इंसानियत की तलाश

क्या किसी महिला का अतीत उसके वर्तमान और उसके मानवीय कार्यों को तय करता है? ‘जीवनधारा’ एक ऐसी युवती की मार्मिक कहानी है, जो खुद शोषण की शिकार होने के बाद समाज की ठुकराई महिलाओं को सम्मान और नई जिंदगी दिलाने के लिए संघर्ष करती है। यह कहानी समाज के दोहरे चरित्र, महिला अस्मिता और मानवीय संवेदनाओं पर गंभीर सवाल उठाती है।

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जालंधर में बाढ़ का संकट गहराया, कई ट्रेनें रद्द और डायवर्ट

पंजाब में लगातार हो रही भारी बारिश ने हालात गंभीर बना दिए हैं. नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है और कई ज़िले बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं. अब जालंधर में भी खतरा बढ़ गया है. सतलुज नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद निचले इलाकों में पानी भरना शुरू हो गया है, जिससे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है. मिली जानकारी के अनुसार, गिदड़पिंडी- मखू रेलखंड पर बने पुल नंबर 84 पर पानी का स्तर खतरे के निशान के करीब पहुँच गया है

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आसान नहीं है पुरुष होना…

पुरुष होना कई मायनों में सरल नहीं। दुनिया उन्हें मजबूत देखना चाहती है, मगर दर्द छुपाने की कला में वे अक्सर अकेले पड़ जाते हैं। हम लड़कियाँ आँसू पोंछने को काजल-लाइनर का सहारा ले लेती हैं, मुस्कान को लिपस्टिक से गहरा कर देती हैं। पर पुरुष? वे रोते भी कम हैं और जब रोते हैं तो छुपाने की सुविधा भी कहाँ होती है उनके पास।

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पुणे में डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का शिकार बने वरिष्ठ नागरिक का प्रतीकात्मक दृश्य

पुणे में ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर ठगी: 82 वर्षीय बुजुर्ग से 2.74 करोड़ रुपये ठगे

पुणे के कोथरुड में एक 82 वर्षीय सेवानिवृत्त व्यक्ति को साइबर ठगों ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर दो महीने में 2.74 करोड़ रुपये ट्रांसफर करवा लिए। आरोपी खुद को जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर लगातार दबाव बनाते रहे।

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माँ की पुरानी नीली साड़ी को हाथों में थामे भावुक बेटा और विवाह के जोड़े में वही साड़ी ओढ़े दुल्हन

पल्लू में बँधा आसमाँ

“पल्लू में बँधा आसमाँ” माँ की ममता, स्मृतियों और भावनात्मक विरासत को समर्पित एक मार्मिक हिंदी कहानी है। माधव अपनी दिवंगत माँ की पुरानी साड़ी को केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि बचपन की सुरक्षा, प्रेम और अपनत्व का प्रतीक मानता है। उसकी मंगेतर अनन्या उस साड़ी को अपने विवाह के जोड़े का हिस्सा बनाकर यह सिद्ध करती है कि सच्ची विरासत वस्तुओं में नहीं, उनसे जुड़ी भावनाओं में बसती है। यह कहानी माँ के अटूट स्नेह और परिवार के अमूल्य रिश्तों को बेहद संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है।

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जब बदरा रोया…

यह कविता प्रकृति के विनाश पर चिंता और संरक्षण का संदेश देती है। कवि दिखाता है कि जब पर्यावरण आहत होता है, तो धरती की सुंदरता और जीवन का संतुलन दोनों बिगड़ जाते हैं। वह मानव से आग्रह करता है कि जंगल बचाए, प्रदूषण रोके और संसाधनों का संयमित उपयोग करे। अंत में कवि आशा जताता है कि यदि हम प्रकृति से प्रेम करें और उसकी रक्षा करें, तो धरती फिर से हरियाली, सुगंध और आनंद से भर जाएगी।

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