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महाकाल की महिमा अब सिनेमा में

साउथ सुपरस्टार पवन कल्याण अभिनीत मेगा बजट फिल्म ‘हरिहर वीरमल्लू (धर्मयुद्ध)’ 24 जुलाई को देशभर में पांच भाषाओं में रिलीज हुई। इस ऐतिहासिक फिल्म में उज्जैन के भस्म रमैया भक्त मंडल को धर्म की धुरी के रूप में विशेष भूमिका मिली है। यह फिल्म विदेशी आक्रांताओं द्वारा भारत में किए गए मंदिरों के विध्वंस और सनातन धर्म की रक्षा में समर्पित वीरमल्लू के जीवन पर आधारित है। फिल्म में पवन कल्याण ने धर्मरक्षक वीरमल्लू की भूमिका निभाई है, जबकि बॉबी देओल औरंगज़ेब के रूप में नजर आएंगे।

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चांदनी रात में फूलों से भरे बगीचे में नज़ाकत से चलती एक सुंदर स्त्री, चारों ओर महक और रोमांटिक वातावरण

इश्क़ का सुकून

यह ग़ज़ल मुहब्बत के नाज़ुक और खूबसूरत एहसासों को बेहद सलीके से प्रस्तुत करती है। इसमें प्रिय के रूप, उसकी अदाओं और उसके प्रभाव को प्रकृति के बिंबों के माध्यम से उकेरा गया है—जहाँ नज़ारे शरमा जाते हैं, फूल मदहोश हो जाते हैं और हवाएँ भी बेखुद हो उठती हैं। शायर के लिए प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि एक ऐसा आध्यात्मिक अनुभव है जो जीवन के सफर को उजालों और सुकून से भर देता है।

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6/11 मुंबई आतंकी हमले के दौरान ताज होटल में अपने परिवार के साथ डरी हुई ज़ीनत – भावनात्मक हिंदी कहानी

आख़िरी रात

ज़ीनत की ज़िंदगी बागबानी, परिवार और अपने छात्रों के बीच खुशी से बीत रही थी। शादी की सालगिरह मनाने के लिए वह अपने पति फ़रीद और बेटे के साथ मुंबई के ताज होटल पहुँचती है। लेकिन 26 नवंबर 2008 की वह रात उनकी ज़िंदगी की सबसे भयावह रात बन जाती है। गोलियों, धमाकों और दहशत के बीच यह कहानी सिर्फ़ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि इंसानियत, प्रेम और आतंकवाद के खिलाफ़ खड़े होने वाले साहस की भी मार्मिक दास्तान है।

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जीवन जंग नहीं

यह कविता जीवन को केवल संघर्ष और काँटों से भरा हुआ मानने की मानसिकता को तोड़ती है। कवि कहता है कि जीवन सिर्फ कठिनाइयों और कटु अनुभवों का नाम नहीं है, बल्कि इसमें फूलों जैसी सुंदरता, मधुरता और उमंगें भी समाई हुई हैं।
जीवन की राह में यदि कोई विचलित होकर बीच में ही रुक जाए तो वह अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुँच सकता। पराजय के डर से भागने वाला कभी विजयी नहीं कहलाता। अंधकार से भयभीत होकर रुकने वाला व्यक्ति प्रकाश की ओर कदम नहीं बढ़ा सकता। दूरी से हताश होने वाला कभी मंज़िल तक नहीं पहुँच पाता।

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गुरु की छाया में गढ़ता जीवन

शिक्षक जीवन के आधार स्तंभ होते हैं। जैसे कुम्हार कच्ची मिट्टी को चाक पर घुमाकर नया आकार देता है, वैसे ही शिक्षक बच्चों के कोमल और अबोध मन को गढ़ते हैं। बचपन में माता-पिता से बोलना, चलना और सहारा लेना सीखा जाता है, लेकिन जब शिक्षा के मंदिर में पहला कदम रखा जाता है, तब बच्चा पहली बार माता-पिता का हाथ छोड़कर एक नए वातावरण में प्रवेश करता है।

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परीक्षा केंद्र के बाहर प्रवेश पत्र और किताबें हाथ में लिए शांतिपूर्वक बैठे भारतीय विद्यार्थी, जिनके चेहरों पर टूटे सपनों, संघर्ष, निराशा और न्याय की उम्मीद साफ़ दिखाई दे रही है। यह दृश्य पेपर लीक से प्रभावित युवाओं की पीड़ा और बेहतर भविष्य की उनकी आशा का प्रतीक है।

सपनों का टूटना

‘सपनों का टूटना’ एक मार्मिक सामाजिक कविता है, जो पेपर लीक, युवाओं के संघर्ष, बेरोजगारी, अन्याय और टूटती उम्मीदों की दर्दनाक सच्चाई को उजागर करती है। कविता उन लाखों विद्यार्थियों की पीड़ा को स्वर देती है, जिनकी वर्षों की मेहनत भ्रष्ट व्यवस्था के कारण प्रभावित होती है। यह रचना केवल आक्रोश नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध एकजुट होकर आवाज़ उठाने और बदलाव की उम्मीद का भी संदेश देती है।

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उम्मीदों की खिड़की से

ज़िंदगी में कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएँ, उम्मीदों की खिड़की हमेशा खुली रहनी चाहिए। दुनिया कुछ भी कहे, लेकिन अपने हौसले को मज़बूत बनाए रखना ज़रूरी है। आंधियाँ आएँ तो भी दिल का दिया जलता रहना चाहिए। इंसान को पत्थर नहीं बनना है, बल्कि टूटकर और तराशकर अपने आप को बेहतर बनाना है। इम्तिहान तो जीवन में बार-बार आएँगे, लेकिन हर बार हमें अपने लक्ष्य पर टिके रहना है। यही उम्मीद और यही हौसला हमें आगे बढ़ने की ताकत देते हैं।

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जरूरी

दामोदर ने कहा, “शहर में तीन दिन से कर्फ्यू था। आज हटते ही दो सौ रुपए की मजदूरी हुई। कल बाबा का श्राद्ध है, कुछ किराना ले आता हूँ।”
पत्नी ने चिंता जताई, “अम्मा की तबियत देख लो, पांच बार उल्टी की और बुखार भी तेज है।”
दामोदर ने पूछा, “फिर क्या करूँ?”
पत्नी ने कहा, “नुक्कड़ वाले डॉक्टर साहब के पास चलो। इलाज जरूरी है।”दामोदर ने मान लिया, “हाँ, सही है। पहले अम्मा का इलाज।”

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महिदपुर रोड का पहला जलसा: चटर्जी नाइट

साल 1980 का महिदपुर रोड, गलियों में हलचल थी और हर कोई पहले बड़े जलसे “चटर्जी नाइट” की तैयारियों में व्यस्त। यह जलसा प्रिय शिक्षक स्व. कपूर साहब की स्मृति में आयोजित किया गया था। मंच की कमी के बावजूद विद्यार्थियों ने खाली ड्रम और लकड़ी के स्लीपर से एक शानदार मंच तैयार किया। जब प्रभात चटर्जी और उनका आर्केस्ट्रा मंच पर आए, तालियों और उत्साह की गूँज में पूरा महिदपुर रोड मंत्रमुग्ध हो गया। यह केवल संगीत का आयोजन नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और जुनून की मिसाल बन गया।

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