सर्टिफिकेट
सिर्फ़ शादी होना सर्टिफिकेट नहीं होता, माँ!” — अनीता की ये बात एक सशक्त सामाजिक सवाल खड़ा करती है: क्या एक स्त्री की स्वतंत्रता और निर्णय का मापदंड सिर्फ विवाह होना चाहिए?
नीले अंबर तले हरी उम्मीदें !
“लेते जो श्वास हम, उसे पर्यावरण देता हमें।
हर महीने में इक पेड़ लगा ले ये हम।
नीला अम्बर, हरी भू बना ले ये हम।”
भंँवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राज कुंँवर….
मेरे जीवन की वाड़ी, जिसे मैंने प्रेम और समर्पण से सींचा, फूलों-सी महकी और पत्तों-सी निखरी। भौंरे उसकी मिठास में आकर्षित होकर अपने हिस्से का रस ले गए। मैंने जिन लोगों को अपना मानकर आगे बढ़ने का हिस्सा बनाया, उनका साथ भी किसी उद्देश्य से था—पर वे सगे नहीं थे, और समय ने उनके असली चेहरे दिखा दिए। उनकी ज़रूरतें और इच्छाएँ अधिक थीं, और जब तक मैं काम आता, वही काफी था। फिर भी, हौसलों को बुलंद रखकर, नेक काम करके, आगे बढ़ जाना ही सही राह है।
कल, और आज़
कल और आज़—दोनों समय की धुरी पर खड़े हैं। जो पल बीत गया, वह केवल स्मृति है, खट्टे-मीठे अनुभवों और तीखे शब्दों से भरा हुआ। वह कल मेरा प्रारब्ध नहीं बन सका, इसलिए उसे थामे रहना व्यर्थ है। आज़, जो अभी मेरी साँसों में धड़क रहा है, वही सच्चा गीत है, वही वास्तविक उत्सव है। आज़ ही वह क्षण है जो मुझे आनंदित कर रहा है, जो मुझे जीने का कारण दे रहा है। इसलिए कल की ओर लौटकर पछताने से बेहतर है कि आज़ को पकड़कर जिया जाए।
पोस्टकार्ड से जागा ग्रामीण भारत
पुणे के सामाजिक उद्यमी प्रदीप लोखंडे ने पोस्टकार्ड और पुस्तकों के माध्यम से ग्रामीण भारत में पढ़ने की संस्कृति विकसित की और लाखों बच्चों का भविष्य बदला।
भक्ति और श्रद्धा के सागर में डूबा नगर
नगर में आध्यात्मिक उल्लास और भक्ति की अनुपम छटा देखने को मिली, जब श्रीराम हनुमान मंदिर सेवा समिति के तत्वाधान में श्रीमद् भागवत कथा का शुभारंभ भव्य कलश यात्रा के साथ हुआ. बैंड-बाजों की मधुर धुन, ढोल-नगाड़ों की थाप और हरिनाम के जयघोष से पूरा नगर भक्तिमय वातावरण में सराबोर हो गया. सैकड़ों श्रद्धालुओं की सहभागिता, पुष्पवर्षा और श्रद्धा भाव ने इस पावन आयोजन को अविस्मरणीय बना दिया. पं. सुनीलकृष्ण व्यास के ओजस्वी प्रवचनों ने कथा के प्रथम दिवस को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया, जिससे नगरवासियों में शांति, भक्ति और आनंद का संचार हुआ.
प्रेमपत्र से वंचित लेखक
यह लेख एक हास्य-व्यंग्य शैली में लिखा गया आत्मकथन है, जिसमें लेखक अपनी असफलता का कारण मज़ाकिया अंदाज़ में पत्नी को ठहराते हैं। वह बताते हैं कि जवानी में यदि पत्नी ने उनके प्रस्ताव पर तुरंत “हाँ” न कहा होता, तो उनके भीतर “दिल टूट रस”, “बेचारा रस” और “मजनूं रस” उमड़ते और वे शायरी, कविताएँ व लेखों के माध्यम से एक बड़े लेखक बन जाते। मगर पत्नी ने उन्हें प्रेम-पत्र लिखने या भावुक कविताओं में ढलने का कोई अवसर ही नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि लेखक के भीतर मौजूद सारे “रस” वातावरण के अभाव में बाहर ही नहीं निकल पाए। लेख हल्के-फुल्के हास्य, नोकझोंक और आत्मव्यंग्य के माध्यम से यह संदेश देता है कि जीवन की दिशा और रचनात्मकता अक्सर निजी परिस्थितियों और रिश्तों से प्रभावित होती है।
फूलों की माला, हवा का राग”
“हर्षित धरा, हर्षित अंबर, कोहरे की विदाई, भौंरे और तितलियों की मुस्कान। दहकते पलाश, हरे-हरे परिधान, पीली सरसों की सजती दुकान। गेहूँ और चने की झूमती बाली, कोयल की मतवाली कूक। अमलतास की झूलती डालियाँ, फूलों की माला लिए प्रीत खड़ी है द्वार पर—सारी धरती बसंत से प्यार में डूबी हुई।”
श्रद्धा और उल्लास से मनाया शासन स्थापना दिवस
महिदपुर रोड में जैन समाज ने वैशाख सुदी ग्यारस पर शासन स्थापना दिवस मनाते हुए श्री सुविधिनाथ जैन मंदिर में शासन ध्वज फहराया और सामूहिक आराधना की।
