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जो टूटी नहीं.. वो राशि थी

राशि अब भी रोज़ लड़ती है—कभी खुद से, कभी हालातों से, और कभी रिश्तों की खामोश दीवारों से। पर अब उसकी लड़ाई किसी को मनाने की नहीं, खुद को साबित करने की भी नहीं… अब उसकी लड़ाई खुद को खोने से बचाने की है।

उस दिन जब वो मंच पर खड़ी थी, साड़ी के पल्लू में कॉर्पोरेट पहचान और आंखों में एक मां की नमी समेटे—तब शायद पहली बार उसने खुद को पूरा महसूस किया।

जिसने कभी सपने पूरे करने के लिए किसी का सहारा नहीं माँगा, आज वो अपने संघर्ष की इमारत में अपनी बेटी के लिए खिड़कियाँ बना रही थी—जहाँ से आर्या रोशनी देख सके, आज़ादी की हवा महसूस कर सके। राशि जान चुकी थी—”परफेक्ट” दिखना ज़रूरी नहीं, खुद को समझना, स्वीकारना और थामे रखना उससे कहीं ज़्यादा बड़ा काम होता है।

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जब सवाल कपड़ों का नहीं, मानसिकता का हो

भारत में बलात्कार की घटनाएँ हर उम्र और वर्ग को प्रभावित कर रही हैं छोटी बच्चियाँ, किशोर, महिलाएँ और यहाँ तक कि पुरुष भी शिकार बन रहे हैं। यह केवल शरीर का नहीं, मानसिकता का अपराध है। समाधान क़ानून के साथ-साथ शिक्षा, संवेदनशीलता और समाजिक चेतना में निहित है।

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वो इस जमाने का ही रहा…

मेरे हिस्से में हवाओं का  कुछ कतरा ही रहा सांस चलती रहे बस इतना मिलता रहा  मेरे मर्म से गुजरता वो  सुबह शाम रहा कभी ठहरा कभी नाकाम रहा  आदतन वो इस  जमाने का ही रहा मुंतजिर क्यों रहूं  जो कहीं और चला जबकि पता है वो  किसी का भी न रहा थपेड़ों से घायल…

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काश के फूल

डॉ. मंजूलता, प्रसिद्ध साहित्यकार, नोएडा काश! मैं फूल होती काश कातुम्हारे मानस-पटल परपड़ी स्याह परतों परअपने नर्म-नर्म फूलों सेरुई के फाहे-सा ढक देती। ख़्वाहिशें जो तुम्हारीदबी-दबी-सी हैं, उन्हें काश के फूलों केउड़ते-हिलते फाहों सेसजा देती। बिखरते तो ख़्वाहिशों की तरहकाश के फूल भी,पर शरद ऋतु आतेकहाँ रोक पाते खिलनेसे ख़ुद को! तेरे मन में भी…

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मुंबई में आयोजित हुआ ‘केवल काव्य परिवार’ का भव्य काव्य संध्या समारोह

चेन्नई से पधारे कवि-उद्योगपति केवल कोठारी के सम्मान में हुआ आयोजन नवी मुंबई, 14 जून साहित्यिक प्रेमियों के लिए शनिवार की शाम खास रही, जब सेक्टर-21, खारघर में आयोजित हुई एक भावपूर्ण और भव्य काव्य संध्या। यह आयोजन “केवल काव्य परिवार” के संस्थापक, चेन्नई से पधारे उद्योगपति व कवि श्री केवल कोठारी के मुंबई आगमन…

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कीचड़ में खिला कमल का फूल, जो संघर्ष और पवित्र प्रेम का प्रतीक है

कीचड़ का कमल

कीचड़ का कमल” प्रेम और जिम्मेदारियों के बीच फँसी एक स्त्री के अंतर्द्वंद्व को बखूबी उकेरती है। यह कविता बताती है कि हर प्रेम कहानी मुकम्मल नहीं होती कभी परिस्थितियाँ, कभी परिवार और कभी सच का सामना रिश्तों को बदल देता है। यहाँ प्रेम पवित्र है, लेकिन आत्मसम्मान और परिवार की गरिमा उससे भी बड़ा सत्य बनकर उभरते हैं।

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डाइनिंग टेबल पर साथ बैठे परिवार के सदस्य, लेकिन सभी मोबाइल में व्यस्त, पीछे अकेले बैठे बुजुर्ग।

सब साथ हैं… फिर भी अकेले

आज घरों में सुविधाएँ बढ़ गई हैं, लेकिन रिश्तों में समय और अपनापन कम होता जा रहा है। यह लेख सिर्फ संयुक्त परिवारों के टूटने की नहीं, इंसानों के भीतर बढ़ते अकेलेपन की कहानी है।”

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प्रेरणा की स्वामिनी

यह कविता वेदना को संबोधित करते हुए लिखी गई है। कवि पूछता है कि क्यों हृदय थका हुआ और मन उद्विग्न है, क्यों विरह की बदली आँसुओं से भरी रहती है और क्यों उसे आकाश का कोई कोना भी नसीब नहीं होता।

वह वेदना को प्रेरणा की देवी मानकर कहता है कि सभी लोग तुम्हें आधुनिक मीरा कहते हैं—क्या तुम्हें भी विषपान करना पड़ा? कवि चाहता है कि जैसे गणपति प्रथम पूज्य हैं, वैसे ही वह वेदना को पूज्य मानकर आराधना करे, क्योंकि काव्य-जगत में वही उसकी सबसे बड़ी प्रेरणा है।

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