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रेडियो स्टेशन पर खामोश होते लम्हे

दौर के विविध भारती स्टेशन पर ‘हमारे मेहमान’ कार्यक्रम के लिए रिकॉर्डिंग तो सिर्फ आधे घंटे चली, लेकिन जब फांसी की पुरानी घटना का जिक्र हुआ, तो माहौल एकदम बदल गया। एनाउंसर सुधा शर्मा जी गीत के बीच अचानक मौन हो गईं — “रहे ना रहे हम, महका करेंगे…” गीत की पंक्तियाँ जैसे कमरे की संवेदना में घुल गईं।
जब मैंने 1996 में उज्जैन सेंट्रल जेल में देखी गई फांसी की घटना सुनानी शुरू की, तो सुधा जी की आँखों से आंसू बहने लगे। वे रुमाल से आँखें पोंछतीं, लंबी साँस भरतीं और कहतीं, “हां भाई साब, आगे बताइए…”
उनका हर सवाल—“सच में देखा?”, “डर नहीं लगा?”, “नींद आ गई थी उस रात?”—एक गहरी संवेदना और जिज्ञासा से भरा था। इंटरव्यू से ज़्यादा वक्त उस घटना की परतें खोलते हुए बीता।

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कवयित्री सुरभि डागर का रचनात्मक चित्र

सुरभि डागर : सादगी, संवेदना और सृजन का सुंदर संगम

रभि डागर समकालीन हिंदी साहित्य की उन रचनाकारों में हैं, जिनकी लेखनी संवेदनाओं को शक्ति में बदलने की क्षमता रखती है। उनकी रचनाएँ जीवन की सच्चाई, रिश्तों की ऊष्मा और स्त्री-मन की कोमलता को बेहद सहजता से अभिव्यक्त करती हैं। वे अपने आसपास घटित घटनाओं को केवल देखती नहीं, बल्कि उन्हें गहराई से महसूस कर शब्दों में ढाल देती हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ बनावटी नहीं, बल्कि जीवन का सजीव प्रतिबिंब प्रतीत होती हैं।

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सावन की बारिश में अपने प्रिय का इंतजार करती एक युवती

सावन को आने दो

कुछ भाव ऐसे होते हैं जो शब्दों में नहीं ढल पाते, लेकिन सावन की पहली बारिश उन्हें आवाज़ दे देती है। “सावन को आने दो” ऐसी ही एक भावुक कविता है, जहाँ अनकहे जज़्बात बादलों के साथ उमड़ते हैं, बारिश की हर बूंद प्रेम का संदेश बन जाती है और मन किसी अपने की प्रतीक्षा में भीग उठता है। यह कविता प्रेम, प्रतीक्षा और मानसून की मधुर अनुभूतियों को बेहद संवेदनशीलता से व्यक्त करती है।

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गठरी…

उसने आवाज दी, और मैं चल पड़ी—अपनी भावनाओं की गठरी उठाए हुए। पास पहुंचने पर जाना कि उसके मन की हर गली कितनी सँकरी है, हर कोना कितना सीमित। उन सँकरी गलियों में चलते-चलते मैं खुद भी सिकुड़ गई। चारों ओर अँधेरा था, और मैं उसी अँधेरे में भटकती हुई आखिरकार उसके पास पहुँची। वह वहाँ था. खुश, बेफिक्र और अपने आप में मशगूल। न उसे मेरा इंतज़ार था, न मेरी कोई ज़रूरत। तब एहसास हुआ जहाँ ज़रूरत नहीं, वहाँ ठहरना नहीं चाहिए। मगर लौटने का रास्ता तो मैं भूल चुकी थी। अब वही सवाल मन में गूंजता है मैं क्या करूँ? इस भावनाओं की गठरी का बोझ कैसे उठाऊँ?

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मैं नारी हूँ पर अबला नहीं

मैं नारी हूँ, पर अबला नहीं। मेरे आँसुओं में कमजोरी नहीं है, बल्कि वह आग है जो सबको झुलसा सकती है। नारी ईश्वर की अनुपम रचना है। वह घर-आँगन और खेत-खलिहान में गीतों की तरह झूमती है। ममता की गागर और जीवन की धारा उसकी आत्मा में प्रवाहित हैं। वह सृजन की मिट्टी से गढ़ी गई और करुणा से सींची गई है।

फिर भी, कभी उसे भोग्या बना दिया गया, कभी जायदाद समझा गया, और कभी बंधनों में बाँध दिया गया। लेकिन वही नारी मातृशक्ति बनी, महिषासुर का वध किया और अपने परिवार की रक्षा करती रही। अब वह निर्भीक होकर खड़ी है, अन्याय से डरती नहीं और चुनौतियों का सामना करते हुए अपने अस्तित्व को आज़ाद कराती है। स्वतंत्र देश की स्वतंत्र नारी नवयुग का स्वर्णिम आगाज़ है।

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गहनों की बेड़ियों में बंधी हुई एक महिला, जो समाज में नारी की स्थिति और संघर्ष को दर्शाती है

अधूरी पहचान

“नारी का अस्तित्व बस इतना सा…” कविता समाज में नारी की वास्तविक स्थिति और उसके संघर्षों को उजागर करती है। यह रचना दर्शाती है कि कैसे नारी को कभी देवी तो कभी दासी बनाकर उसके अधिकारों को सीमित किया गया। यह कविता नारी सम्मान, समानता और सशक्तिकरण का गहरा संदेश देती है।

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ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे

मधु झुनझुनवाला ‘अमृता‘ प्रसिद्ध साहित्यकार, जयपुर (राजस्थान) मुंतज़िर थे हमीं न कल होंगे ।ये लम्हे क्या कभी अज़ल होंगे । फ़िक्र अब है कहाँ मुहब्बत में,ज़ीस्त में क्यों सनम दख़ल होंगे । दिल बुझेंगे कभी जो फुर्कत में,ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे । बाद मेरे इन्हीं निगाहों में ,अश्क़ में तर हसीं कँवल होंगे…

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टूटना एक डाल का…

जीवन की आंधियाँ जब चलती हैं, तो सिर्फ डालियाँ ही नहीं, कई बार इंसान भी टूट जाते हैं . अपने ही सदाचार और शुभ कर्मों के बोझ से। इस टूटने में भी एक सच्चाई है जैसे परिंदों के घोंसले बिखर जाते हैं, पर वे नई जगह फिर से घर बना लेते हैं। कोयल की तान कहीं खो जाती है, मगर उसकी खोज जारी रहती है। यही जीवन का शाश्वत चक्र है . गिरना, बिखरना और फिर उठना।

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आत्मविश्वास से भरी एक भारतीय महिला, स्वतंत्र और सशक्त व्यक्तित्व को दर्शाती हुई

एक नारी की अभिव्यक्ति

यह कविता एक ऐसी स्त्री की आवाज़ है, जिसने रिश्तों के बोझ से ऊपर उठकर खुद को पहचानना सीख लिया है। वह अब समझौते नहीं करती, बल्कि अपने आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के साथ जीना चुनती है।

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शिक्षक का आशीर्वाद

बचपन में मैंने अक्सर शिक्षक बनने का खेल खेला था। आज समझ आता है कि वह खेल केवल खेल नहीं था, बल्कि एक गहरी सीख थी। शिक्षक होना वास्तव में प्रेम, धैर्य और आनंद की कला है। हर विद्यार्थी अलग होता है और उसके लिए नए ढंग से समझ का ताना-बाना बुनना पड़ता है।

शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान उसकी सरलता है—वह कठिन से कठिन विषय भी सहज तरीके से समझा देता है। यही ईश्वर का दिया हुआ अमूल्य उपहार है। गुरु और शिष्य का रिश्ता पवित्र और जीवनभर साथ रहने वाला होता है। गुरु का आशीर्वाद शब्दों से भी भारी है, क्योंकि वही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।

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