यादें तुम्हारी शामिल रहेंगी
कुछ यादें समय के साथ धुंधली नहीं होतीं. यह भावपूर्ण रचना प्रेम, विरह, अधूरी बातों और उन यादों को शब्द देती है, जो हमेशा दिल में शामिल रहती हैं.

कुछ यादें समय के साथ धुंधली नहीं होतीं. यह भावपूर्ण रचना प्रेम, विरह, अधूरी बातों और उन यादों को शब्द देती है, जो हमेशा दिल में शामिल रहती हैं.
सद्गुरु दादा जे. पी. वासवानी की जयंती (2 अगस्त – ग्लोबल फॉरगिवनेस डे) के उपलक्ष्य में सद्गुरु वासवानी मिशन की युवा शाखा ‘ब्रिज बिल्डर्स’ द्वारा पुणे, मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और न्यूयॉर्क में ‘मूवमेंट ऑफ कैल्म’ वॉकाथॉन का आयोजन किया गया।
पुणे के कोरेगांव पार्क में बारिश के बावजूद 800 से अधिक प्रतिभागी सुबह 6:30 बजे 3 किमी की इस अद्वितीय यात्रा में शामिल हुए। शुरुआत सद्गुरु वासवानी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (SVIMS) से हुई। वॉक से होने वाली आय नि:शुल्क बच्चों की हृदय शल्य चिकित्सा के लिए दान की जाएगी।
समाचारों में बुज़ुर्गों के साथ बढ़ते अत्याचार की खबरें मन में भय और भविष्य की चिंता भर देती हैं। लेकिन एक दिन बेटे-बहू का लिया गया छोटा-सा निर्णय एक माँ के जीवन की सारी धुंध छाँट देता है। पढ़िए “छटती धुंध”, परिवार, अपनत्व और बुज़ुर्गों के सम्मान का मार्मिक संदेश देती एक भावनात्मक लघुकथा।
माँ चूल्हे की आँच में तपकर जीवन को महकाती है। आटे की लोई में वह अपने सपनों को गूँथती और बेलती है। दिनभर की थकान उसके चेहरे से तब गायब हो जाती है जब थाली में पकवानों की खुशबू फैलती है और परिवार का हर सदस्य संतोष से भोजन करता है। बच्चों की चमकती आँखों में उसे अपनी सबसे बड़ी तृप्ति मिलती है।
उसके लिए खाना सिर्फ शरीर का ईंधन नहीं है, बल्कि घर का प्रेम है, जिससे परिवार जीवित और आनंदित रहता है। उसकी रसोई एक तपोवन है, जहाँ वह हर दिन निस्वार्थ भाव से यज्ञ करती है
ह कविता क्रिकेट के मैदान में उतरती लड़कियों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण, आत्मविश्वास और सामाजिक रूढ़ियों के टूटने की कथा कहती है। चौके-छक्कों से लेकर इतिहास रचने तक, यह रचना बताती है कि खेल कैसे करोड़ों लड़कियों के भीतर साहस और आकाश छूने की आकांक्षा जगा रहा है।
अर्चना ज्ञानी, उज्जैन कर्मनिष्ठा और निरंतर प्रयास सेउच्च शिखर पर बढ़ती रहो। अपनी लक्ष्मण-रेखास्वयं खींचकर,मान-सम्मान की गरिमामयीघृत-दीपज्योति बनो। पवित्र आँगन की श्याम तुलसी,चौरे की राम तुलसी जैसी मर्यादित,सागर-सी गंभीरता,आकाश-सी विशालता लिए,नभ में अरुंधति-सी चमकती रहो। मेरे आँगन में हल्दी-कुंकू की रंगोली-सीसदा तुम दमकती रहो।मेरे पावन संस्कारों में पली,चेहरे पर मर्यादा-मोहिनी सजाए,सदा तुम चहकती रहो। माँ…
मीठी नदी के आत्मस्वर में कही गई एक भावपूर्ण यात्रा है. जहाँ स्वप्नों की मिठास लेकर वह उदधि से मिलन को निकल पड़ती है। खारापन स्वीकार्य है, क्योंकि हर जन्म की प्यास वहीं शान्त होती है। वर्षों की भटकन, नयनों में भरा जल, और नमन से भरा समर्पण सब मिलकर प्रेम, प्रतीक्षा और स्वीकार की एक शान्त, उजली कथा रचते हैं।
द्रौपदी और श्रीकृष्ण के बीच यह संवाद “विश्वास का वस्त्र” महाभारत की उस पीड़ा को उजागर करता है, जहाँ नारी अस्मिता पर प्रश्न उठे। यह रचना विश्वास, धर्म, और नारी सम्मान के गहरे अर्थ को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करती है।
रिश्तों की सबसे बड़ी पूँजी छोटी-छोटी खुशियाँ होती हैं। यह कविता प्रेम, इकरार, मुलाक़ात और इंतज़ार के उन अनमोल पलों को संजोने का संदेश देती है, जहाँ मुस्कान और अपनापन ही रिश्ते की सबसे सुंदर पहचान बन जाते हैं।