ज्ञान का सागर
‘ज्ञान का सागर’ एक प्रेरक हिंदी कहानी है, जिसमें कबाड़ी के काम से बने विशाल पुस्तकालय और ज्ञान के प्रति जुनून की मार्मिक कथा है।

‘ज्ञान का सागर’ एक प्रेरक हिंदी कहानी है, जिसमें कबाड़ी के काम से बने विशाल पुस्तकालय और ज्ञान के प्रति जुनून की मार्मिक कथा है।
“मशरूम का स्वाद हो या मटन-फिश का, कई बार भोजन के प्रति हमारी पसंद-नापसंद सिर्फ स्वाद की बात नहीं होती। यह हमारी परवरिश, संस्कृति और बचपन की थाली का असर होता है। जब कभी आपसे कोई आग्रह करे कि ‘बस एक बार टेस्ट कर लो’, तो याद रखिए—हर स्वाद के पीछे एक स्मृति होती है। मशरूम को लेकर मन की दूरी, स्वाद कलिकाओं की नहीं, बल्कि गहरे संस्कारों और भावनाओं की कहानी है। खाने का चुनाव शरीर और आत्मा दोनों की सहमति से होता है।”
पुरुष ज़ुबां से कम बोलते हैं, पर उनकी आँखें सब कह देती हैं. प्यार, फ़िक्र, थकान और छुपी हुई नमी। ज़िम्मेदारियों में दबे हुए भी वे घर की जड़ बनकर सबकी खुशी में खुद को भूल जाते हैं।
“सांवला रंग” एक प्रेरक लघुकथा है जो समाज में व्याप्त रंगभेद की मानसिकता पर गहरा प्रहार करती है। कहानी में एक माँ अपने जीवन में झेले गए तिरस्कार को याद करते हुए संकल्प लेती है कि उसकी बेटी की पहचान उसके रंग से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा और उपलब्धियों से होगी। वर्षों की मेहनत और समर्पण का परिणाम तब सामने आता है जब उसकी बेटी आई.पी.एस. अधिकारी बनकर पूरे शहर का गौरव बन जाती है।
मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित अलंकरण समारोह में सुप्रसिद्ध युवा रचनाकार डॉ. वर्षा महेश गरिमा को उनकी प्रथम कृति क्षितिज की ओर (कविता संग्रह) के लिए प्रादेशिक स्तर का पंडित बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार प्रदान किया गया.यह समारोह राजधानी भोपाल के रवीन्द्र भवन स्थित अंजनी सभागार में संपन्न हुआ, जहाँ साहित्य जगत से जुड़े अनेक विद्वान, रचनाकार और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे.कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात खेल कमेंटेटर पद्मश्री सुनील दोषी रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में संस्कृति विभाग के संचालक एन. पी. नामदेव उपस्थित थे.
आज मोहब्बत के तौर-तरीके बदल चुके हैं। अब प्रेम चिट्ठियों में नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन पर लिखे मैसेज और इमोजी में छुपे दिल के संदेशों में दिखाई देता है। कभी व्हाट्सएप कॉल से मुलाक़ात शुरू होती है तो कभी वीडियो चैट में जज़्बात उमड़ते हैं।
जहाँ पहले चाँद-तारों की बातें होती थीं, वहीं अब ऑनलाइन स्टेटस ही बहुत कुछ कह जाता है। “टाइपिंग…” का छोटा-सा शब्द भी दिल की धड़कनों को तेज़ कर देता है और चैट बॉक्स ही दिल के हालात का दर्पण बन जाता है।
सेल्फ़ी में मुस्कान, फिल्टर का जादू और रील्स में झलकता इश्क़ आज के रिश्तों की पहचान बन चुके हैं। कभी स्वाइप लेफ़्ट, कभी स्वाइप राइट — यही है मोहब्बत का नया डिजिटल अंदाज़।
फिर भी सच्चाई यही है कि दिल आज भी वैसा ही है जैसा पहले था। जिसे चाहा वही सबसे क़ीमती खजाना है। तकनीक और साधन बदल गए, तौर-तरीके बदल गए, पर प्यार का जादू आज भी उतना ही पुराना और उतना ही सुहाना है।
जिसे तुम बाहर ढूँढते फिर रहे हो, वह सब तुम्हारे भीतर है। धरती के छोर से लेकर आकाशगंगाओं के पार तक, जो भी दिखाई देता है, वह उसी एक ऊर्जा की भिन्न–भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। सूर्य की गर्मी, चाँद की शीतलता, समुद्र की गहराई, हिमालय का शौर्य, गंगा की पवित्र धार सब उसी शक्ति के रूप हैं। वह शक्ति न किसी दिशा में सीमित है, न किसी समय में बँधी। वह अनंत है और सर्वव्यापी है। भगवा इसी अनंत प्रकाश का प्रतीक है .जो न कहीं शुरू होता है और न कहीं समाप्त।
जो इसे पा लेता है — वह समझ जाता है कि खोज बाहर नहीं, भीतर की ओर मुड़ने में है।
सब उसी से जन्मा है और अंततः उसी में विलीन होना है।
राशि अब भी रोज़ लड़ती है—कभी खुद से, कभी हालातों से, और कभी रिश्तों की खामोश दीवारों से। पर अब उसकी लड़ाई किसी को मनाने की नहीं, खुद को साबित करने की भी नहीं… अब उसकी लड़ाई खुद को खोने से बचाने की है।
उस दिन जब वो मंच पर खड़ी थी, साड़ी के पल्लू में कॉर्पोरेट पहचान और आंखों में एक मां की नमी समेटे—तब शायद पहली बार उसने खुद को पूरा महसूस किया।
जिसने कभी सपने पूरे करने के लिए किसी का सहारा नहीं माँगा, आज वो अपने संघर्ष की इमारत में अपनी बेटी के लिए खिड़कियाँ बना रही थी—जहाँ से आर्या रोशनी देख सके, आज़ादी की हवा महसूस कर सके। राशि जान चुकी थी—”परफेक्ट” दिखना ज़रूरी नहीं, खुद को समझना, स्वीकारना और थामे रखना उससे कहीं ज़्यादा बड़ा काम होता है।
अखबारों की सुर्खियाँ कभी–कभार दहला देती हैं.जान देती बच्चियाँ, दबा दी जाती चीखें,और घोंघे सी रफ्तार से सरकतीं फाइलें। कुछ अमायरा साहस करती हैं, कुछ सहती हैं, कुछ ज़हर के घूंट पी जाती हैं…और कुछ अंतिम मुक्ति चुन लेती हैं।
बाल-दिवस पर याद आती है अमायरा. जिसकी मासूमियत दुनिया की क्रूरता से हार गई।
दौर के विविध भारती स्टेशन पर ‘हमारे मेहमान’ कार्यक्रम के लिए रिकॉर्डिंग तो सिर्फ आधे घंटे चली, लेकिन जब फांसी की पुरानी घटना का जिक्र हुआ, तो माहौल एकदम बदल गया। एनाउंसर सुधा शर्मा जी गीत के बीच अचानक मौन हो गईं — “रहे ना रहे हम, महका करेंगे…” गीत की पंक्तियाँ जैसे कमरे की संवेदना में घुल गईं।
जब मैंने 1996 में उज्जैन सेंट्रल जेल में देखी गई फांसी की घटना सुनानी शुरू की, तो सुधा जी की आँखों से आंसू बहने लगे। वे रुमाल से आँखें पोंछतीं, लंबी साँस भरतीं और कहतीं, “हां भाई साब, आगे बताइए…”
उनका हर सवाल—“सच में देखा?”, “डर नहीं लगा?”, “नींद आ गई थी उस रात?”—एक गहरी संवेदना और जिज्ञासा से भरा था। इंटरव्यू से ज़्यादा वक्त उस घटना की परतें खोलते हुए बीता।