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पाकिस्तान में आटा 135 रुपये किलो पार

इस्लामाबाद.पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर भूख और महंगाई संकट का सामना कर रहा है. गेहूं और आटे की कीमतों में बेतहाशा उछाल ने हालात बिगाड़ दिए हैं. सरकार भले ही पर्याप्त स्टॉक होने का दावा कर रही हो, लेकिन बाजार की तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही है. कराची समेत देशभर…

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नारी शक्ति का प्रतीक भारतीय महिला, जिसमें दुर्गा, मीरा और रानी लक्ष्मीबाई के रूपों की झलक दिखाई दे रही है

स्त्री की वाणी

वह केवल एक स्त्री नहीं, बल्कि अनगिनत रूपों का संगम है दर्द को आँखों में समेटे हुए भी अडिग खड़ी। वह चौखट की मर्यादा भी है और जीवन की हर जिम्मेदारी का आधार भी। कभी दुर्गा बनकर शक्ति का प्रतीक बनती है, तो कभी मीरा बनकर भक्ति में विलीन हो जाती है। उसके भीतर द्रौपदी की प्रतिज्ञा है, पद्मिनी का त्याग है और झांसी की रानी सा साहस भी। वह मौन रहकर भी बहुत कुछ कहती है, सहनशीलता में भी आग समेटे रहती है। वही मां है, वही बेटी और उसी से इस संसार की हर कहानी, हर रिश्ते और हर अस्तित्व की शुरुआत होती है।

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प्रिय के इंतजार और प्रेम की भावनाओं को दर्शाती रोमांटिक हिंदी कविता की यथार्थवादी छवि।

तुम लौट आओ…

यह भावपूर्ण हिंदी कविता प्रेम और प्रतीक्षा की उस कोमल अनुभूति को व्यक्त करती है, जहाँ किसी प्रिय के लौट आने की उम्मीद जीवन को फिर से संवार देने का विश्वास बन जाती है। हर पंक्ति में विरह, चाहत और मिलन की मधुर आकांक्षा झलकती है।

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भगवान गणेश की पीड़ा

भगवान गणेश की पीड़ा

ग्यारह दिनों तक मेरे भक्त मेरे दर्शन को तरसते रहे और मैं उनके प्रेम से अभिभूत था। परंतु विसर्जन के दिन जब बारह घंटों तक जल में खड़ा रहा, तब मैंने सच्चाई देखी।
मंडपों में लोग धक्का-मुक्की कर रहे थे, बहसबाजी कर रहे थे, आगे बढ़ने के लिए एक-दूसरे को गिरा रहे थे। सेवक भी अपना रोब दिखा रहे थे।
मैंने सोचा—पंडाल में नहीं तो क्यों न खुले आसमान और समुद्र की लहरों के बीच सबको समान रूप से दर्शन दूँ। वहाँ न कोई कतार, न कोई वीआईपी, न कोई भेदभाव। लेकिन… मेरे भक्तों ने वहीं भी मुझे याद दिला दिया कि इंसान ने भगवान को भी अपने बनाए हुए अमीर-गरीब और ऊँच-नीच के नियमों में बाँध दिया है।

मैं तो वही एकदंत गजानन हूँ—चाहे लालबाग में विराजमान रहूँ या किसी छोटे पंडाल में, या फिर गिरगांव चौपाटी की लहरों में।मेरे लिए सिर्फ एक ही चीज़ महत्वपूर्ण है—मन से की गई भक्ति। बाकी सब इंसानी दिखावा है।”**

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सवाल मैं, जवाब में सन्नाटा

वो सबके लिए मोहब्बत बरसाता है, लेकिन मुझे किसी तमाशे की तरह अनदेखा कर देता है। उसकी रहमतें जब हर गली को भिगोती हैं, तब भी मैं सूखी ही रह जाती हूँ। जिसे कभी पलकों पर बिठाया था, वही मेरी आँखों में कांटे चुभो जाता है। मैं अपने सवालों में उलझी रहती हूँ, और वो जवाबों में सन्नाटा छोड़ जाता है। दूसरों की ज़िंदगी में वो सौ रंग भर देता है, मगर मेरे हिस्से हमेशा अंधेरा ही आता है। वो खुद भीड़ का हिस्सा बनकर चल पड़ता है, और मुझे तन्हाई में छोड़ जाता है। जब भी लौटता है शहर से, “गौरी”, तो बस उदासी का कोई नया किस्सा दे जाता है।

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डॉ. संजुला सिंह ‘संजू’ को ‘मातृभाषा रत्न’ से सम्मानित

जमशेदपुर की साहित्यकार डॉ. संजुला सिंह ‘संजू’ को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर शब्द प्रतिभा फाउंडेशन नेपाल द्वारा “मातृभाषा रत्न” मानद उपाधि से सम्मानित किया गया।

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वजूद की छैनी

माँ होना जैसे मेरा सबसे बड़ा अपराध बन गया। हर कोई मेरे किरदार को अपनी-अपनी सुविधानुसार तराशता रहा। किसी ने कभी नहीं पूछा कि मैं क्या चाहती हूँ .क्या चाह कर जियूँ, कैसे जीना चाहूँ। सबने सिर्फ़ अपने अपने फैसले मेरे ऊपर रख दिए। सवाल, ताने, धारदार जजमेंट सब मुझ पर ही बरसते रहे। मेरी अपनी छोटी-सी चाहत, अपनी-सी ज़िंदगी… कब छूट गई, मुझे याद भी नहीं। बस इतना समझ आया है कि मैं कहीं रास्ते में ही पीछे रह गई और “मैं” का वो छोटा-सा किस्सा, बहुत पहले तमाम हो चुका है।

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जो दिखता है, वह पूरा नहीं स्त्री जीवन के अनकहे अध्याय

शीशमहल” हो या “अंतिम प्रश्न”, कविता वर्मा की कहानियाँ उस स्त्री की कथा कहती हैं जो ना केवल अपनी भूमिका से बंधी है, बल्कि अपनी पहचान के लिए छटपटाती भी है। ये कहानियाँ घर के भीतर की उन संकरी गलीयों की पड़ताल करती हैं, जहाँ स्त्री होना एक उत्तरदायित्व नहीं, एक दंड जैसा महसूस होता है। लेखिका का दृष्टिकोण कहीं भी रोमैंटिक नहीं होता, बल्कि बेहद यथार्थपरक और भीतर तक धँसता हुआ है। स्त्री को सहानुभूति नहीं, समझ की ज़रूरत है — यही संदेश इन कहानियों की अंतर्धारा है।”

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शायद ये इत्तेफ़ाक ही था…

एक संयोग-भरी ट्रेन यात्रा में सामने बैठी एक सभ्रांत, गुमसुम महिला ने लेखक की आत्मा को अनकहे शब्दों से छू लिया। उसकी उदास आँखों में जैसे कई अनलिखी कहानियाँ थीं, और उसकी खामोश मुस्कान में छिपे इंद्रधनुषी रंग बार-बार पुकारते थे। दो मुसाफ़िर कुछ पल साथ, फिर अपने-अपने स्टेशनों की ओर। समय बीत गया, उम्र बढ़ी, लेकिन उस अनाम उदासी भरे चेहरे की याद दिल की तहों में आज भी महफ़ूज़ है।

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नगर निगम का टैंकर पानी भरते हुए

पुणे में जल संकट गहराया, टैंकरों की मांग तेजी से बढ़ी

मार्च की शुरुआत के साथ पुणे में पानी की कमी गंभीर होती जा रही है। उपनगरों और नए शामिल गांवों में टैंकरों की मांग तेजी से बढ़ रही है और नगर निगम को बड़ी संख्या में टैंकरों से पानी उपलब्ध कराना पड़ रहा है।

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