
नमिता गुप्ता ‘श्री’
दुबका सूरज ओढ़ रजाई शहर शहर।
आँचल में गहरी ठहरी सी शीत लहर।।
टोपा मोजा स्वेटर साल ओढ़ कम्बल,
जालिम ठंडी नहीं है होती तितर-बितर।
बर्फ के गोले खेले पहाड़ों पर चुन्नू- मुन्नू ,
किट-किट दाँत बजे सर्दी बड़ी भयंकर।
घिर आए बदरा बूँदें भी बरसे रिमझिम,
बादल ओट लिए सूरज ठंठी का कहर।
अलाव जला दूर भगाएं जालिम ठंडी को,
तिल गुड़ मूँगफली की सोंधी चटरपटर।
रजनी कर श्रृंगार देख अम्बर में मचले,
रुक ओढ़ रजाई सो लेने दो जरा ठहर।
शबनमी मणियों ने धरा श्रृंगार किया,
गुनगुन धूप खिले चेहरे’श्री’प्रीत नजर।

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