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विजया गार्डन जमशेदपुर में सावन महोत्सव के दौरान महिलाओं का उत्सव

सावन के रंग में रंगा विजया गार्डन, झूम उठीं महिलाएं

जमशेदपुर के विजया गार्डन में सावन महोत्सव के दौरान महिलाओं ने गीत-संगीत, नृत्य और रंग-बिरंगे परिधानों के साथ जमकर उत्सव मनाया। पूर्णिमा साहू की मौजूदगी ने कार्यक्रम की रौनक बढ़ाई।

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मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम: मर्यादा, त्याग और मानव जीवन का संदेश

मर्यादा पुरूषोतम

मनुष्य रूप में प्रभु श्रीराम का अवतार मर्यादा, त्याग और संघर्ष का अद्भुत संदेश देता है। प्रस्तुत कविता उसी दिव्य स्वरूप को भावपूर्ण श्रद्धांजलि है।

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ऐ ज़िंदगी… तू क्यों इतनी शरारतें है करती?

ऐ ज़िंदगी…

ऐ ज़िंदगी… कभी ममतामयी माँ बनकर लाड़ लड़ाती है, तो कभी पिता बन संघर्षों से लड़ना सिखाती है। कभी खुशियों की चाशनी में डुबोती है, तो कभी ग़मों के काँटे चुभाती है। लेकिन अब समझ आया—तेरी हर शरारत के पीछे कोई न कोई सबक़ छिपा होता है।

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परिवार के बीच अपनी पीड़ा छिपाती भावुक भारतीय महिला की यथार्थवादी छवि

विष वमन

राजेश्वरी ने परिवार की खुशियों के लिए अपनी पीड़ा को वर्षों तक भीतर दबाए रखा। रिश्तों में मिले विश्वासघात और शोषण का विष आखिर कितना सहा जा सकता है? यह कहानी उसी अनकही पीड़ा और मौन आह की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

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अर्णव और मायरा की नोकझोंक और प्यार को दर्शाता खुशहाल भारतीय दंपति का दृश्य

मस्ती भरा रिश्ता

कुछ रिश्तों में प्यार के साथ नोकझोंक, शरारत और हँसी भी घुली होती है। अर्णव और मायरा की यह कहानी बताती है कि कभी-कभी एक-दूसरे को परेशान करना भी प्यार जताने का खूबसूरत तरीका होता है।

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सावन में मिठाई की दुकान पर घेवर और फेनी देखकर मायके और माँ को याद करती भावुक महिला

राखी, फेनी और माँ 

सावन की फुहारों के साथ सुमन को अपने मायके और माँ की याद सताने लगती है। राखी, फेनी और घेवर से जुड़ी छोटी-सी याद उसे उन रिश्तों तक ले जाती है, जो अब उसके जीवन में नहीं हैं।

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सीता और राम के प्रेम, विरह और भावनात्मक संघर्ष को दर्शाती यथार्थवादी साहित्यिक छवि

मैं सिया सी… और तुम राम

प्रेम जब विश्वास मांगता है और रिश्ते परीक्षा लेने लगते हैं, तब सिया के मन में राम से कई अनकहे सवाल जन्म लेते हैं। यह कविता उसी प्रेम, पीड़ा, विरह और स्त्री के आत्मसम्मान की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

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मीरा तुम कहाँ हो? एक अधूरी दोस्ती और आदिवासी लड़की के संघर्ष की मार्मिक कहानी

मीरा तुम कहाँ हो

तीन दशक पहले मिली एक आदिवासी लड़की मीरा, जो पढ़ाई में बेहद होशियार थी और जीवन में आगे बढ़ना चाहती थी। लेकिन परिस्थितियों ने उसकी राह रोक दी। वर्षों बाद हुई एक मुलाकात ने दोस्ती, सपनों और बिछड़ने की ऐसी कहानी छोड़ दी, जिसका सवाल आज भी कायम है मीरा तुम कहाँ हो?

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आम आदमी

आम आदमी

आम आदमी एक साधारण शब्द जरूर है, लेकिन उसके भीतर असाधारण हौसला, संवेदनशीलता, उम्मीद और इंसानियत छिपी होती है। यह कविता उसी आम आदमी के बड़प्पन को सलाम करती है।

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