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महेश शुक्ला: दोस्ती, डांट और प्यार का अनोखा सफर

पुणे की मंडली आज भी कर रही इंतजार अकोला में बैठे हैं अपने ‘डॉन’ महेश शुक्ला

आप मुझे ढूंढ रहे हो और मैं आपका यहां इंतजार कर रहा हूं..ये दोनों डायलॉग अमिताभ बच्चन की फिल्मों में एक में उनका इंतजार हो रहा है दूसरे में वो किसी का इंतजार कर रहे हैं. एकदम कंट्रास्ट. एक दम उलट. वैसे ही हमारे अग्रज, हमारे सहयोगी, हमारे आशीर्वाद दाता महेश शुक्ला भी एकदम कंट्रास्ट है. वे जैसे हैं वैसे दिखते नहीं… जैसे दिखते हैं वैसे हैं नहीं. 60 की उम्र के बाद भी (असली उम्र नहीं बताउंगा) यदि किसी ने उनके प्रति इस बात के लिए सहानुभूति जताई कि वे बुजुर्ग हैं तो भले ही आपको मुंह पर कुछ नहीं कहे लेकिन मन में जरुर कहेंगे बुड्ढा होगा तेरा बाप… क्योंकि इस उम्र में भीशख्सियत हेलमेट लगाकर जब केटीएम जैसी स्पोर्टस बाइक चलाते हैं तो अच्छे-अच्छे युवाओं को पीछे छोड़ देते हैं.

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जीवन एक अमूल्य अभिलेख : नफ़रत से हारो मत

आज का जीवन बहुत उलझा हुआ है जहाँ सब कुछ अनिश्चित है—साँस से लेकर रिश्तों तक, ठहराव से लेकर बहाव तक। नई पीढ़ी चकाचौंध और भटकाव के बीच उलझ रही है, जबकि यही स्वतंत्रता और खुले आकाश की राह पिछली पीढ़ियों की संघर्षशील महिलाओं ने तैयार की थी। इस संदर्भ में ओपरा विनफ्रे का जीवन प्रेरणा देता है, जिन्होंने नफ़रत और कठिनाइयों से हार न मानकर ईमानदारी और साहस से अपने साधारणपन को असाधारण बना दिया। उनका संदेश स्पष्ट है—झूठ से बचो, ईमानदार रहो, और भय की जगह साहस को चुनो।

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रीमा राय सिंह बनीं राष्ट्रीय कवि संगम मुंबई की नई अध्यक्ष

राष्ट्रीय कवि संगम की मुंबई महानगर इकाई के पुनर्गठन समारोह में विश्वप्रसिद्ध संगीतकार सरदार कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में श्रीमती रीमा राय सिंह को नई अध्यक्ष घोषित किया गया। राष्ट्रीय अध्यक्ष जगदीश मित्तल ने ऑनलाइन संबोधन में कहा कि रीमा जी के नेतृत्व में इकाई ‘राष्ट्र जागरण धर्म हमारा’ के ध्येय वाक्य को सार्थक करेगी। कार्यक्रम में अनेक प्रसिद्ध कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं से साहित्यिक वातावरण को भावपूर्ण बना दिया।

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दो बचपन के दोस्त वर्षों बाद मिलते हुए, सच्ची दोस्ती और पुराने रिश्ते को दर्शाता भावनात्मक दृश्य।

30 साल बाद भी कायम है श्याम सिंह का साथ

कुछ दोस्त रिश्तों से नहीं, दिल से जुड़े होते हैं। श्याम सिंह और उनके दोस्त की 30 साल पुरानी दोस्ती बताती है कि सच्चा साथ समय और परिस्थितियों से कभी नहीं बदलता।

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सिस्टम, सिस्टमैटिकली बच निकला..

तो ख़बर ये है, मित्र… कि सिस्टम हमेशा की तरह सिस्टमैटिकली अपने बाल भी बाँका किए बिना फिर से बच निकला है, जैसे उसे संविधान की किसी फुटनोट में कोई स्पेशल छूट मिली हो.
एक बार फिर, एक स्कूल की छत ढह गई और हमेशा की तरह, मासूम बच्चे ढहती दीवारों के नीचे दब गए. कुछ घायल हुए, कुछ अनंत यात्रा पर निकल लिए…
आप कहेंगे, ऐसी तो और भी इमारतें ध्वस्त हुई हैं भूस्खलन हुआ, बाढ़ आई, करंट लगने से भी अच्छे-खासे जान और माल की हानि हुई फिर आप इस एक सरकारी इमारत के पीछे क्यों पड़े हैं?
बस इसीलिए कि ये सरकारी थी.
सरकार इधर खुद की जोड़-तोड़ में लगी है. एक बार फिर आपने उसे व्यस्त कर दिया ङ्गहमें दुःख हैफ की बजरी, ङ्गदोषियों को बख्शा नहीं जाएगाफ के सीमेंट और सरकारी ब्रांड के मगरमच्छी आँसुओं का पानी मिलाकर एक गाढ़ा लेपन तैयार हुआ है जिससे की जाएगी लीपापोती.

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मालवा में संजा पर्व के दौरान किलाकोट बनाती ग्रामीण किशोरियां

संजा: वह दीवार, वे गीत और जीजी के पीछे-पीछे चलता मेरा बचपन

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे शाम होते ही गांव की गलियों में एक अलग ही हलचल शुरू हो जाती थी. घरों के चूल्हों से उठता धुआं धीरे-धीरे आसमान में घुलता, गाय-बछड़े लौटकर अपने ठिकानों पर पहुंचने लगते और खेतों से आती हवा में मिट्टी की सोंधी गंध घुल जाती. इसी समय मेरी बड़ी…

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रावण बहुतेरे

आज रावण के पुतले भले ही जलाए जाएँ, लेकिन वास्तविक रावण अब दस सिर वाले नहीं हैं। वे एक सिर वाले हैं और समाज में असंख्य रूपों में मौजूद हैं। जहाँ बाहर श्याम वस्त्रों में रावण का प्रतीक जलता है, वहीं श्वेत वस्त्रों में छुपे अनेक रावण रोज़ हमारे बीच घूमते हैं। यह रावण अब केवल सीता-हरण तक सीमित नहीं रहे, बल्कि हर दिन न जाने कितनी सीताओं का अपहरण और चीर-हरण होता है। मासूमियत की नीलामी होती है और हवस की भट्टी में उसका भस्म किया जाता है। असली चुनौती इन सफेदपोश रावणों का दहन करने की है। सच्चा विजयदशमी तभी होगी जब इनका सर्वनाश किया जाए।

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अजन्‍मी बेटी के सवाल

यह कविता एक अजन्मी बेटी की मार्मिक पुकार है, जो अपनी मां से सवाल करती है कि उसने जन्म से पहले ही उसकी जीवन-रेखा क्यों मिटा दी। वह बताती है कि वह तो मां की धड़कन भर थी, फिर भी उसे क्यों बोझ समझा गया। बेटे की चाह में मां ने समाज के उसूलों को मान लिया, पापा और दादी की तरह उसने भी बेटी के आने को नापसंद किया। वह कल्पना करती है कि अगर उसे जन्म मिला होता, तो वह सुनीता विलियम्स, कल्पना चावला, इंदिरा गांधी, किरण बेदी, साक्षी मलिक या पी. वी. सिंधु जैसी बनकर मां का नाम रोशन कर सकती थी। अंत में, वह कहती है कि अगर मां ने थोड़ा सा प्यार दिया होता, तो वह अपना पूरा जीवन मां की सेवा और सपनों को पूरा करने में लगा देती, लेकिन उसकी इच्छाओं को अनदेखा कर दिया गया। यह रचना बेटियों के प्रति समाज में फैली कुप्रथाओं और भ्रूण हत्या पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है।

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दीक्षांत समारोह में आकांक्षा शर्मा को गोल्ड मेडल देते हुए राज्यपाल और मुख्यमंत्री

महिदपुर रोड की बेटी आकांक्षा शर्मा का परचम

महिदपुर रोड की प्रतिभाशाली छात्रा आकांक्षा शर्मा ने सम्राट विक्रम विश्वविद्यालय में एमएससी जूलॉजी में प्रथम स्थान प्राप्त कर शानदार उपलब्धि हासिल की। 30वें दीक्षांत समारोह में उन्हें राज्यपाल मंगू भाई पटेल एवं मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा दो गोल्ड मेडल और “बेस्ट स्टूडेंट” सम्मान से नवाजा गया। उनकी इस सफलता से पूरे महिदपुर रोड में गर्व और उत्साह का माहौल है।

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मेरा श्रृंगार

यह कविता उस प्रेम की है जहाँ साथी केवल जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन का श्रृंगार बन जाता है। मेंहदी की खुशबू, चूड़ियों की खनक और पायल की रुनझुन सब उसी के स्पर्श से अर्थ पाते हैं। सुख–दुख में साथ निभाने वाले प्रेम के उस रूप को यह पंक्तियाँ समर्पित हैं, जो मोह-माया से परे होकर भी दिल पर अपना गहरा रंग छोड़ जाता है. जैसे आत्मा का श्रृंगार।

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