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संजा: वह दीवार, वे गीत और जीजी के पीछे-पीछे चलता मेरा बचपन

मालवा में संजा पर्व के दौरान किलाकोट बनाती ग्रामीण किशोरियां
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सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे

शाम होते ही गांव की गलियों में एक अलग ही हलचल शुरू हो जाती थी. घरों के चूल्हों से उठता धुआं धीरे-धीरे आसमान में घुलता, गाय-बछड़े लौटकर अपने ठिकानों पर पहुंचने लगते और खेतों से आती हवा में मिट्टी की सोंधी गंध घुल जाती. इसी समय मेरी बड़ी बहन, जिसे हम सब प्यार से जीजी कहते थे, संजा के गीत गाने निकलती थी.
और मैं?
मैं भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ता था…
संजा से मेरा लगाव तब उतना गहरा नहीं था, जितना जीजी के साथ मिलने वाले उस छोटे-से लालच से था. जीजी की चार-पांच सहेलियों के घर संजा की आरती और गीत होते थे और आरती के बाद प्रसाद मिलता था. बस, मेरे लिए संजा के पीछे चलने की सबसे बड़ी वजह यही थी.
प्रसाद भी कोई तय चीज नहीं होती थी. जिसके घर जैसी आर्थिक स्थिति, वैसा प्रसाद. हमारे यहां तो बाई कभी ककड़ी देतीं, कभी डोचरा. डोचरा एक तरह का खरबूजे जैसा फल होता था, जो मक्के की फसल के साथ अपने आप खेत में उग आता था. उस उम्र में मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि यह संजा का प्रसाद है या खेत की मेहरबानी. मेरे लिए तो जीजी के पीछे चलना और अंत में हाथ में कुछ खाने को मिल जाना ही काफी था. आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है, उस समय मैं प्रसाद लेने नहीं, अनजाने में अपनी लोक-संस्कृति का प्रसाद लेने जाता था. वह संजा थी.और वह सिर्फ दीवार पर बनी गोबर की आकृति नहीं थी.वह हमारे गांव की बेटियों की अपनी दुनिया थी.

एक दीवार, जिस पर किशोरियों के सपने उगते थे
गणेश विसर्जन के दूसरे दिन यानी भाद्रपद पूर्णिमा से श्राद्ध पक्ष के सोलह दिनों तक मालवा, निमाड़ और राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में संजा का मौसम होता था.शाम ढलते ही घर की बाहरी दीवार का कोई छोटा-सा हिस्सा किशोरियों के लिए कैनवास बन जाता. ताजा गोबर, फूल, पत्तियां और चमकीली पन्नियां जुटाई जातीं. किसी के हाथ में कनेर के पीले फूल होते, कोई गुलाब की पंखुड़ियां लेकर आती और कोई संजा को सजाने के लिए सुनहरी-रूपहली पन्नियां संभालकर रखती. उस समय यह सब देखकर शायद हमें यह एहसास नहीं था कि हम जिस चीज को खेल और उत्सव समझ रहे हैं, वह दरअसल पीढ़ियों से चली आ रही लोकस्मृति है.संजा की आकृति बनती और उसके सामने किशोरियों की टोली जमा हो जाती. आरती होती, गीत गाए जाते और फिर कुछ देर के लिए लगता जैसे गांव की वह दीवार बोलने लगी हो.संजा उन लड़कियों की सखी थी. वे उसे सजाती थीं, उससे बतियाती थीं, उसके लिए सपने देखती थीं और उसके गीतों में अपने मन की बातें भी कह देती थीं. एक ओर श्राद्ध पक्ष में पुरखों की स्मृतियां थीं, तो दूसरी ओर किशोर होती बेटियों के मन में विवाह, मायका, ससुराल, पति, गहने और आने वाले जीवन की कल्पनाएं. संजा इन दोनों के बीच खड़ी थी.एक पैर अतीत में और दूसरा भविष्य में.

सोलह दिन और सोलह रूप
संजा के सोलह दिनों में हर दिन की अपनी आकृति होती थी. इन आकृतियों के नाम और स्वरूप स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग मिलते हैं, लेकिन उनकी कल्पना और उत्साह में एक अद्भुत समानता थी. पूनम का पाटला, एकम की छाबड़ी, बीज का बीजौरा, तीज का घेवर या तारा छाबड़ी, चौथ का चांद या चौपड़, पंचमी का पांच कटोरा या पांच पाचे, छठ की छै पांखुड़ी या छाछ का बिलोना, सप्तमी का सातिया, अष्टमी का बंदनवार या आठ पत्तियों वाला फूल, नवमी का नगाड़ा या नौ डोकरिया, दशमी का दिया या दीपक, ग्यारहवीं का गलीचा या केले का वृक्ष, बारहवीं का पंखा या बंदनवार और फिर तेरहवीं से सोलहवें दिन तक बनने वाला किलाकोट.
हर आकृति के साथ किशोरियों की कल्पना भी फैलती जाती थी.
गोबर की छोटी-सी आकृति से शुरू हुआ संसार धीरे-धीरे गांव के पूरे जीवन का चित्र बन जाता था.
गोबर बीनना भी किसी अभियान से कम नहीं था
आज की पीढ़ी को शायद यह बात अजीब लगे कि किसी पर्व की तैयारी में गोबर जुटाना भी उत्सव का हिस्सा हो सकता है.
लेकिन तब ताजा गोबर मिलना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं था.
गोबर मिल गया तो फूलों की तलाश शुरू. चांदनी के दूधिया-सफेद फूल, कनेर के पीले फूल, गेंदे के फूल, सदासुहागन के फूल. कभी फूल मांगकर लाए जाते, कभी सहेलियों के घर से मिल जाते और कभी चोरी-चुपके तोड़कर लाए जाने का रोमांच भी शामिल होता. जीजी के लिए संजा बनाने में बाई भी मदद करती थी. बाई मूल रुप से राजस्थानी थी.. इसलिए उसमें कला और चित्रकारी के प्रति स्वाभाविक आकर्षण था. जो कभी कभी उसके द्वारा गेरु और खड़ी से बनाएं गए मांढनों में या रक्षाबंधन पर बनाए गए श्रवणकुमार या सीतला सप्तमी पर हाथ से लगाए गए छापों में दिख जाता था. पहले कच्ची दीवार पर पानी का छींटा दिया जाता, एक छोटे हिस्से को गोबर से लीपा जाता और उस पर संजा आकार लेने लगती.
आज बच्चे रंगों की डिब्बियां खोलकर चित्र बनाते हैं. तब हमारे गांव की बेटियां गोबर, फूल, पत्तियों और अनगढ़ कल्पनाओं से कला रचती थीं.शायद यही कारण है कि उन आकृतियों में वह आत्मीयता थी, जो बाजार से खरीदे गए रंगों में नहीं मिल सकती.
फिर शुरू होता था गीतों का संसार
संजा बन गई तो असली उत्सव शुरू होता था आरती से.. आरती भी कुछ नहीं.. थाली में दिया लेकर लड़कियां… पहली आरती.. दूसरी आरती… से शुरुआत करती थी.. उसके बाद का मुझे कुछ याद नहीं आ रहा परंतु आरती के बाद लड़कियों के कंठ से लोकगीत फूटते. किसी गीत में संजा सज-संवरकर मायके में बैठी होती, किसी में ससुराल जाने की तैयारी कर रही होती और किसी में अपनी सास से परेशान. छोटी-सी गाड़ी गुड़कती जाए…जिमे बैठी संजा बाई, घाघरो घमकाती जाए चुड़ेलो चमकाती जाए… जैसे गीतों में संजा केवल एक काल्पनिक पात्र नहीं रह जाती थी. उसकी चूड़ियां खनकती थीं, नथ झूलती थी, घाघरा लहराता था और वह जैसे गांव की किसी गली से सचमुच गुजरती हुई दिखाई देती थी.

जीजी जिनके हाथों से सजता था किलाकोट

गीतों में संजा की इच्छाएं थीं.उसके सुख-दुःख थे.
उसका मायका था.उसका ससुराल था.और सबसे बढ़कर, उसका अपना मन था. यह उन किशोरियों की भाषा थी जिसमें वे विवाह और ससुराल के बारे में अपनी कल्पनाएं व्यक्त कर सकती थीं. वे हंसते हुए सास की शिकायत करतीं, पति की कल्पना करतीं, कपड़ों और गहनों पर नखरे करतीं और रूठने-मनाने के गीत गातीं.
किलाकोट: जब पूरी दीवार गांव बन जाती थी
संजा के दिनों में सबसे ज्यादा उत्सुकता किलाकोट को लेकर रहती थी.किलाकोट केवल एक आकृति नहीं था. वह दीवार पर बसा हुआ पूरा गांव था. गेरू या चूने से उसकी रूपरेखा बनाई जाती. फिर गोबर से अलग-अलग आकृतियां उकेरी जातीं. चांद-सूरज, कमल, स्वस्तिक, ढोली, भिश्ती, जाड़ी जसोदा, पतली पेमाजी और ग्रामीण जीवन से जुड़े अनेक पात्र उसमें दिखाई देते.चने की पीली दाल और गेहूं के दानों से सजावट होती. भुट्टे के टुकड़े से ढोली का ढोल बनता और झाड़ू की सींक उसकी संटी बन जाती. किलाकोट बनाने में केवल किशोरियां ही नहीं जुटती थीं. पास-पड़ोस की महिलाएं भी हाथ बंटाती थीं.
यहीं से लोकसंस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती थी. कोई किताब नहीं थी.कोई लिखित पाठ्यक्रम नहीं था. बड़ी बहन छोटी बहन को सिखाती थी, मां बेटी को बताती थी और पड़ोस की अनुभवी महिला किसी आकृति को ठीक करने के लिए हाथ बढ़ा देती थी. यही मौखिक परंपरा संजा को जीवित रखती थी.
संजा के गीतों में छिपा था स्त्री जीवन का सच
संजा के गीतों को अगर आज की नजर से पढ़ें तो उनमें स्त्री जीवन की कई परतें दिखाई देती हैं.संजा के पास गहने हैं, कपड़े हैं, हाथी-घोड़े और पालकी हैं, लेकिन फिर भी वह ससुराल जाने को लेकर उत्साहित नहीं है. सहेलियां उसके लाए कपड़ों में भी मीन-मेख निकालती हैं. सास के व्यवहार की शिकायत गीत में होती है.
काम के बोझ पर तंज होता है. और मायके की याद भी बनी रहती है.यानी लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं थे. वे उस समय की स्त्री के अनुभवों को सुरक्षित रखने का एक माध्यम भी थे. किशोरियां शायद यह सब किसी सिद्धांत की तरह नहीं समझती थीं. लेकिन वे गीतों के जरिए जीवन के उन पहलुओं से परिचित हो रही थीं, जिनका सामना उन्हें आने वाले वर्षों में करना था. इस दृष्टि से संजा को देखना आज की पीढ़ी के लिए भी जरूरी है.


और फिर आती थी विदाई…जिसे संजा को परबाना कहते थे
सोलह दिन कब बीत जाते, पता ही नहीं चलता.संजा को अब ससुराल जाना होता.गीतों में रूठना-मनाना चलता और अंततः किलाकोट दीवार से खुरच दिया जाता. इतने दिनों की सारी खुरचन एकत्र की जाती. उसे परात या तगारी में रखा जाता और लड़कियों की टोली नदी या तालाब की ओर निकल पड़ती थी.खारवा में तो बड़ी पुलिया पर परबा आते थे लेकिन यह सिलसिला महिदपुर रोड आने तक भी चला. जीजी की शादी होने के बाद छोटी बहन गुड्डी यह संजा बनाने लगी… और तब उसे परबाने गोगापुर तालाब जाया करते थे.. गोगापुर तालाब तब उतना आकर्षक नहीं था.. जितना आज है. आज तो वहां घाट बने हुए हैं और आकर्षक सज्जा हो चुकी है. पहले तालाब के पहले ही एक पुलिया आती है वहीं पर संजा को परबा दिया जाता था. लेकिन यह कैसी विदाई थी, जिसमें अगले साल लौटने की उम्मीद भी शामिल थी. जिसमें मनुहार होती…संजा, तू थारे घरे जा..जल्दी आजे…और संजा चली जाती.
उसके बाद कन्याओं को जिमाया जाता. खीर-पूड़ी बनती. घर-घर फिर वही आत्मीयता लौटती, जिसमें भोजन केवल भोजन नहीं, रिश्तों की मिठास होता था.
मुझे संजा आज क्यों याद आ गई


कल जगोटी में संजा महोत्सव का कार्यक्रम आयोजित किया गया था. वहां भाजपा नेत्री और हमारे गांव की सरपंच रीतू पाटीदार भी शामिल हुई थी. फेसबुक पर उनकी पोस्ट देखने के बाद संजा याद आ गई. और मेरी संजा किसी किताब में नहीं थी. वह मेरी जीजी के साथ चलती उन शामों में थी. खारवाकला की गलियों में थी…उन चार-पांच सहेलियों के घरों में थी, जहां आरती के बाद प्रसाद मिलता था. कहीं ककड़ी मिलती थी, कहीं डोचरा.उस समय मैं यह नहीं सोचता था कि संजा क्या है, इसकी परंपरा कितनी पुरानी है या इसके गीतों में स्त्री जीवन की कितनी गहरी परतें छिपी हैं.मुझे तो बस इतना पता था कि जीजी संजा गाने जा रही है और उसके पीछे जाने पर कुछ खाने को जरूर मिलेगा.
बचपन कितना मासूम होता है.वह संस्कृति को समझता नहीं, से जीता है. आज जब संजा के बारे में लिखने बैठा हूं तो लग रहा है, उस समय मैं प्रसाद के लालच में जिस रास्ते पर जीजी के पीछे-पीछे चलता था, वह रास्ता मुझे मेरे गांव, मेरी मिट्टी और मेरी लोकसंस्कृति तक ले जा रहा था.
आज की लड़कियों को संजा कैसे समझाएं?
आज की पीढ़ी के लिए संजा को केवल यह कहकर नहीं बचाया जा सकता कि यह हमारी पुरानी परंपरा है. उसे यह बताना होगा कि संजा में उनकी ही उम्र की लड़कियां थीं, जिनके सपने थे, सहेलियां थीं, हंसी थी, प्रेम की कल्पना थी, भविष्य को लेकर उत्सुकता थी और कभी-कभी डर भी था.उन्हें यह बताना होगा कि संजा में कला थी, लेकिन वह किसी कला विद्यालय में नहीं सीखी गई थी.उसमें संगीत था, लेकिन उसके लिए कोई मंच नहीं था.उसमें साहित्य था, लेकिन कोई किताब नहीं थी. एक दीवार थी और उस दीवार पर अपनी दुनिया रचती कुछ किशोरियां थीं. आज हमारे पास मोबाइल है, इंटरनेट है, सोशल मीडिया है और मनोरंजन के अनगिनत साधन हैं. लेकिन उस सामूहिकता का क्या, जिसमें चार-पांच सहेलियां एक साथ बैठकर कुछ बनाती थीं, गाती थीं, हंसती थीं और अपने मन की बातें कहती थीं?शायद संजा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि संस्कृति केवल मंदिरों, पुस्तकों और संग्रहालयों में सुरक्षित नहीं रहती.
वह बच्चों के खेल में भी रहती है….बेटियों के गीतों में भी रहती है.
मां की कही छोटी-सी बात में भी रहती है….और कभी-कभी तो वह एक छोटे से डोचरे में भी छिपी होती है, जिसे पाने के लालच में कोई छोटा भाई अपनी जीजी के पीछे-पीछे संजा गाने निकल पड़ता है.
संजा अब भी कहीं है
संजा के वे दृश्य आज बहुत कम दिखाई देते हैं. ग्रामीण जीवन बदला है, घर बदले हैं, समय बदला है और बच्चों की दुनिया भी बदल गई है..लेकिन मेरी स्मृति में खारवाकला की वे शामें अब भी जस की तस हैं.जीजी आगे चल रही है….मैं पीछे-पीछे हूं…किसी घर के बाहर लड़कियां संजा की आरती कर रही हैं. और शायद वह मेरी मिट्टी ने मेरे हाथ पर रखी हुई लोकसंस्कृति की पहली छोटी-सी पोटली थी. इसलिए जब संजा का मौसम आता है और कहीं से कोई पुराना गीत सुनाई देता है, तो लगता है.. संजा गई नहीं है. वह आज भी वहीं है. किसी पुरानी दीवार पर, किसी भूले हुए लोकगीत में, किसी बहन की स्मृति में और किसी छोटे भाई के मन में…जो कभी प्रसाद के लालच में अपनी जीजी के पीछे-पीछे संजा गाने चला जाता था.

3 thoughts on “संजा: वह दीवार, वे गीत और जीजी के पीछे-पीछे चलता मेरा बचपन”

  1. प्रशाद भी बंद डब्बे में लाई जाती और सबसे पुछा जाता कि बताओ क्या है?

  2. सचमुच कितने अच्छे दिन थे मुझे भी उज्जैन में फ्रीगंज में बिताया अपना बचपन याद आ गया।
    मैं भी अपनी बड़ी बहन के साथ जाती थी।
    आरती और गीत के बाद प्रसाद बांटने से पहले प्रसाद को ढंक कर “सांझी सांझी प्रसाद क्या” पूछा जाता था।सही बताने वाले से प्रसाद बांटने की शुरुआत होती थी।
    चमकीली पन्नी और छोटे छोटे फूलों से सजी संजा आज भी स्मृति में है।
    मालवा की बहुत समृद्ध परम्परा,जो अब विलुप्तप्राय है।
    बहुत अच्छी पोस्ट लगी आपकी।
    बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं 🙏💐

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