
सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर
अभी मंज़िल नहीं चाहत,
सफ़र कुछ देर चल जाए,
पता चल जाएगा हमको,
यहाँ पर कौन भटकाए।
करें मीठी सभी बातें,
मगर पीछे न जाने क्या?
चलो छोड़ो, अजी मीरा,
समेटो जो यहाँ पाए।
जिसे समझे सदा अपना,
यहाँ पर घाव देता है,
मगर दरिया, सखे जानम,
नया इक मोड़ लेता है।
भरोसा अब किसी पर भी,
नहीं हमको यहाँ करना,
समेटो हौसला, मीरा,
समय ही साथ देता है।
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