किश्वर अंजुम की पुस्तक ‘परछाइयां अंधरों की’ से एक लंबी कहानी का दूसरा भाग

किश्वर अंजुम
उसके शौहर फिर से मेडिकल कैंप में गए थे। तीन दिन हो गए थे। अगले दिन उनकी वापसी थी। दोपहर को पड़ोस की कुछ औरतों के साथ दूसरे मोहल्ले में जाना तय हुआ, किसी के घर बैठने। पहले के ज़माने में यूँ मिलना-मिलाना वक्त गुज़ारी का एक शगल था।
जान-पहचान न भी हो किसी से, तो किसी जान-पहचान वाले के साथ उनके मेहमान बनकर जाना आम बात थी। ये तरीका ही उस ज़माने की सोशल नेटवर्किंग कहलाता था।
पड़ोसन ने बताया कि जिनके घर जा रहे हैं, उनका सात-आठ माह का बेटा है और पति पुलिस की नौकरी में हैं। साल भर हुए हैं यहाँ ट्रांसफर पर आए।
महिलाओं की आपसी बातचीत के दौरान, पीछे के बरामदे से लगातार एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज़ आती रही, बहुत देर तक, जबकि मेज़बान महिला का बेटा उनकी गोद में था। पता चला कि बरामदे में बिछे पालने में जो बच्चा था, वह उनके शौहर के साथ काम करने वाले किसी दोस्त का था, जिसकी बीवी की जचगी के दो महीने बाद मौत हो गई थी। बाप ने अपने दोस्त को दे दिया अपने बेटे को कि उसकी ड्यूटी की ज़िम्मेदारियाँ उसे बच्चे की परवरिश का वक्त नहीं दे पा रही थीं।
“यार! तेरे बेटे के साथ ही मेरा बच्चा भी पल जाएगा।”
दोस्त की पत्नी, जो उस दिन की मेज़बान महिला थीं, मुरव्वत में दूसरे के बच्चे को घर तो ले आईं, पर उसकी तरफ़ ज़रा भी ध्यान देती नहीं दिख रही थीं।
“ये तो पूरे समय रीं-रीं करते रहता है, कोई कहाँ तक देखे? आप लोग ध्यान मत दो।”
मेज़बान महिला ने उठकर पीछे का दरवाज़ा बंद कर दिया, जहाँ से बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी।
शादी के दो साल हो गए थे और वो बेऔलाद थी। कोई फैमिली प्लानिंग नहीं की गई थी। न जाने क्यों अभी तक उसकी कोख हरी नहीं हुई थी।
“क्या मैं उस बच्चे को गोद में उठा लूँ?” उसने मेज़बान महिला से पूछा।
बच्चा उसकी गोद में आकर चुप हो गया और उसे टुकुर-टुकुर देखने लगा।
“कितना प्यारा है ये,” उसने कहा।
“हाँ!” पड़ोसन ने हामी भरी, “लेकिन बदनसीब भी है।”
“माँ मर गई और ये दूसरे के घर पड़ा है।”
“ये तो सिर्फ़ अपने बच्चे की तरफ़ ध्यान देती हैं, ये बेचारा यूँ ही रोता रहता है पालने में।”
“सुना है, इसका बाप दूसरी शादी करने वाला है। इसके तो नाना-नानी, दादा-दादी भी नहीं हैं। न जाने इस बच्चे का क्या होगा!” पड़ोसन ने अफ़सोस से कहा।
उफ़! उसका मन भर आया।
वो जितनी देर रही वहाँ, उस बिन माँ के बेचारे बच्चे को सीने से लगाए रही।
कैसी अजीब बात है, कहीं कोई औलाद के लिए तरसे, कहीं कोई माँ के लिए तड़पे।
“क्या ही अच्छा हो अगर मैं इस बच्चे की परवरिश कर लूँ।” उसने धीमे से अपनी पड़ोसन से कहा।
“तुम्हारे पति तैयार होंगे? मुझे तो नहीं लगता। और अभी तो तुम्हारी उम्र ही क्या है? आज नहीं तो कल तुम्हारा अपना बच्चा हो ही जाएगा, तब? तब फिर से ये बच्चा ऐसे ही पड़ा रहेगा, जैसे अभी है।”
“नहीं! मैं ऐसा सलूक इस बच्चे के साथ कभी नहीं करूँगी। मैं इनसे बात करूँगी, इसे गोद ले लूँगी।” उसने मन में सोचा। हालाँकि उसे पता था अच्छी तरह कि इस बात के लिए उसके शौहर कभी राज़ी नहीं होंगे। फिर भी सीने में उमड़ती ममता ने एक आस जगा दी कि शायद मान जाएँ उसके पति।
चाय आ गई। मेज़बान महिला ने उसकी गोद से बच्चा ले लिया और वापस पालने में लिटा दिया।
न मालूम उस नन्ही-सी जान को पालने में वापस डाल देने पर, इसके मन में क्यों कुछ चुभ-सा गया। बच्चे को फिर से अपनी बेचारगी का अहसास हुआ होगा और शायद इसीलिए वो फिर से धीमे-धीमे सिसकने लगा।
एक चिड़िया, अजीब-सी, पंखों में सतरंगी छबक लिए, न जाने किधर से आकर पालने के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी। बच्चा उसे देखकर चुप हो गया और खिलखिलाने लगा।
“देखो-देखो!”
“देखा!”
अचानक सब औरतें हैरान होकर बरामदे में रखे पालने की तरफ़ देखने लगीं।
“वो फिर आ गई।”
“वो चिड़िया उसकी माँ ही है।”
पड़ोसन ने फुसफुसाते हुए कहा।
चिड़िया पालने के चारों तरफ़ उड़ती रही।
‘हुश-हुश’ किसी ने उसे उड़ाना चाहा, वो आँगन में बने दड़बे की छत पर बैठ गई। इधर से उधर होती रही, पर न डरी, न उड़ी।
शाम हो गई थी। ये महफ़िल बरख़ास्त हुई और सब औरतें अपने घरों की तरफ़ चलीं।
“यही दिखाने मैं तुम्हें यहाँ लाई थी।” पड़ोसन ने फिर बात छेड़ी।
“अपने बच्चे से मिलने आती है। खिड़की पर बैठकर चहचहाती है। बच्चे के झूले के चारों तरफ़ चक्कर काटती है। किसी से नहीं डरती। देखा नहीं, बच्चा चिड़िया के आने से कैसे चुप हो जाता है।”
“धत्त! ऐसा थोड़ी होता है।” उसने सिरे से पड़ोसन की बात नकार दी।
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शादी के पहले, अम्मा-अब्बा के साथ रायपुर के एक पुराने मोहल्ले में अपने पुश्तैनी मकान में रहती थी वो। उसे याद आने लगी वहाँ की स्लेट पत्थर से बनी गलियाँ। जब बच्ची थी, तब अपनी सहेलियों के साथ उन गलियों में खूब घूमती। दिन भर कभी इसके, कभी उसके घर सहेलियों का झुंड चक्कर काटता। शौक भी कैसे मज़ेदार रहते! कहीं मोतियों से झालर और परदे बनाने का तरीका सीखने जाते, कहीं क्रोशिया की नई डिज़ाइन की शॉल, कहीं यूँ ही बन्ना-बन्नी गीत सीखने जाते, तो कभी मिलाद में जाते और मिलाद वाली आपा की पेशानियों के बल गिनते, जब वो इन लड़कियों की मंडली को नसीहतें देतीं।
हँसी-खेल में कटते दिनों में एक तकलीफ़देह याद जुड़ी थी। सिंध से आया एक जोड़ा, जिसने उन गलियों में ही किराए के मकान में अपनी गृहस्थी शुरू की थी। वहीं दोनों मियाँ-बीवी ने छोटी-सी परचून की दुकान डाली थी। चूरन, संतरे की गोलियाँ, मीठे टोस्ट और न जाने क्या-क्या, वो खरीदती, जब अब्बा उसे एक-दो आने देते। गलियों में घूमते-घूमते उस परिवार को बढ़ते देखा। उनकी एक बेटी ने जन्म लिया और दुकान भी अच्छी चलने लगी थी। छोटी-सी, गोल-मटोल, गुड़िया-सी परचून वाले की लड़की का नाम बिन्नो था, शायद। बिन्नो बड़ी होने लगी और वो भी तो अब समझदार हो गई थी। घर से बाहर खेलना-घूमना बंद हो गया था। फिर भी जब वो स्कूल जाने निकलती, परचून वाली लड़की बिन्नो अपनी अम्मा की गोद में दिख ही जाती। उसके बाप ने बड़े बाज़ार में दुकान कर ली थी। गली की दुकान में उसकी माँ बैठती थी अब।
उसने बिन्नो को बड़ा होते देखा, ढाई साल की उम्र में उसे बिन माँ के होते देखा। उसके बाप को तीन महीने में ही दूसरी दुल्हन लाते देखा और ये भी देखा कि भरी दोपहरी में सौतिया डाह से जलती बिन्नो की दूसरी माँ कैसे उस बच्ची को सताने के लिए उसे लेकर जलती स्लेट-पत्थर की गलियों में घूमती। ख़ुद चप्पल पहने रहती, पर नन्ही-सी बिन्नो के बिन चप्पल के पाँव गरम पत्थर पर जलते और वो रोती-रोती, उछल-उछलकर चलती, सौतेली माँ के पीछे-पीछे।
उसके नन्हे पंजों के छाले, क्या उसकी मरी माँ को नहीं दिखे? वो क्यों नहीं आई अपनी बेटी को बचाने? ये औरतें भी न, कुछ भी कहानी बनाती हैं।
उसने पड़ोसन से विदा ली और अपने घर में दाख़िल हो गई।
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बापू तेरे देश में…
मेरे हिस्से की पीड़ाएँ
वह कौन ?
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