
स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता
मेरे हिस्से की पीड़ाएँ
मेरे हिस्से में आने दो,
मत डरो प्रिये मेरी ख़ातिर,
समरांगण में लड़ जाने दो।
मैं विजय पताका हूँ लहराना सीखा है,
मैंने हर रण अपने ही बल से जीता है।।
जब दिया, जिसे भी दिया, दिया पूरे मन से,
मैंने बदले में कोई आस नहीं बाँधी।
मैंने अपनों की ख़ातिर खुद को मार लिया,
पर कभी तीर की नोंक नहीं उन पर साधी।
तुम कितने भी आक्षेप लगाओ मगर प्रिये,
भावों की गंगा कलुषित नहीं, पुनीता है।
मैं विजय पताका हूँ लहराना सीखा है,
मैंने हर रण अपने ही बल से जीता है।।
लोगों की ख़ातिर प्रेम भले कमज़ोरी हो,
मेरे मन में यह शक्ति सरीखा बहता है।
तुम कितनी भी नफ़रत करना चाहो मुझसे,
मेरा हर अक्षर प्रेम, प्रेम ही कहता है।
तुम राम जपो अपनी शिद्दत के साथ प्रिये,
मेरे अंदर तो प्रेम बाँटती सीता है।
मैं विजय पताका हूँ लहराना सीखा है,
मैंने हर रण अपने ही बल से जीता है।।
मेरी आँखों के अश्रु मुझे उतने ही प्रिय,
जितना मैंने अपने जाए से प्यार किया।
मैंने अपने हिस्से में विष लिख देने का
खुद नीलकंठ को बढ़कर है अधिकार दिया।
मैं भीरु नहीं, साहस का दूजा नाम प्रिये,
उर के अंदर की ज्वाला सदा अभीता है।
मैं विजय पताका हूँ लहराना सीखा है,
मैंने हर रण अपने ही बल से जीता है।।
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