
प्रदीप श्रीवास्तव, गोमतीनगर लखनऊ
बात वर्ष 2000 की है। मेरी पोस्टिंग सहारनपुर में स्थित शुगर मिल पर थी, जो शहर से 20 कि.मी. दूर थी। मेरे बड़े बेटे सिद्धार्थ रोजाना स्कूल से ट्यूशन के बाद सायंकाल 7 बजे तक बस या टेंपो से कस्बे तक आते थे। कस्बे से रिक्शा लेकर घर तक आते थे।
एक दिन जब कस्बे से घर के लिए आना था, तो पता चला कि उनके पास पैसा बिल्कुल भी नहीं है। घर आने के लिए किसी से लिफ्ट लेने की कोशिश कर रहे थे। कोई साधन नहीं मिलने के कारण परेशान हो रहे थे। तभी सड़क के किनारे बैठा मोची बेटे के पास आकर बोला, “आप साहब के बेटे हो। मैं आपको भी जानता हूँ। क्या प्रॉब्लम है? किसका इंतजार कर रहे हो?”
बेटे ने अपनी प्रॉब्लम बताई कि आज पैसे समाप्त हो गए हैं, इसलिए रिक्शा नहीं कर सकता हूँ। लिफ्ट लेने की सोच रहा हूँ।
मोची ने तुरंत बीस का नोट बेटे की ओर बढ़ाया और बोला, “देर हो रही है। आप तुरंत रिक्शा लेकर घर जाइए।”
बेटे को बहुत संकोच हो रहा था। एक ऐसे मोची से पैसा लेना क्या ठीक है, जिसकी कमाई ही 50 या 60 रुपये रोज की है? खैर, अन्य विकल्प न होने के कारण मोची से पैसे लेकर रिक्शा किया और घर पहुँचे। मोची का आभार व्यक्त करते हुए पूरा दृष्टांत बताया।
मोची को मैं जानता था। दूसरे दिन मैं कस्बे में किसी काम से गया। कार रोककर उसे धन्यवाद दिया और उसकी तरफ 20 का नोट देने के लिए बढ़ाया। उसने हाथ जोड़कर बोला, “मैंने भैया को परेशान देखकर किराया दिया था। यह पैसा मैं नहीं लूँगा। मैं रोजाना भैया को स्कूल से वापस आते देखता था। मेरे ही दुकान पर रुककर रिक्शा किया करते थे। बेटे को रोज-रोज देखकर एक अनजाना-सा लगाव हो गया था।”
बहुत प्रयास के बाद भी उसने पैसे नहीं लिए।
दूसरे दिन घर के सारे जूते ले जाकर, जरूरत न होने पर भी पॉलिश कराया और 40 रुपये दिए। गरीब होते हुए भी इतना बड़ा दिल मैंने पहली बार देखा।
इस घटना के लगभग 6 माह के पश्चात कस्बे में ही रात्रि की शिफ्ट में एक पटाखा फैक्ट्री में हुए विस्फोट में उसकी मृत्यु हो गई। मुझे बेहद तकलीफ हुई।
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