गली में हाथ-ठेला लगाए कलई वाला, भट्टी के पास रखे पीतल के बर्तन और आसपास खड़े उत्सुक बच्चे

इतनी-सी खुशी!

“कलई करा लो…” की पुकार के साथ शुरू होती थी बचपन की हलचल। पीतल के बर्तनों की चमक, भट्टी की आँच और राँगे की खुशबू के बीच छिपी थीं मासूम खुशियाँ। यह संस्मरण केवल कलई की प्रक्रिया का वर्णन नहीं, बल्कि उस दौर की सादगी, पारिवारिक आत्मीयता और छोटी-छोटी बातों में मिलने वाली अपार खुशी की झलक है। आज की चकाचौंध भरी दुनिया में वे दिन याद बनकर मन को भिगो जाते हैं।

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माँ की याद में लिखी गई भावनात्मक चिट्ठी दर्शाती प्रतीकात्मक तस्वीर

मां के नाम आसुंओं से भीगी चिट्ठी

“एक पाती माँ के नाम” एक बेटी का अपनी माँ को लिखा गया हृदयविदारक पत्र है, जिसमें बिछोह, स्मृतियाँ, तन्हाई और माँ की अमिट उपस्थिति शब्दों में ढलती है। यह रचना हर उस पाठक को छूती है जिसने कभी माँ को खोया है।

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गोवा के समुद्र तट पर परिवार के साथ बिताए भावनात्मक पल

वाह… गोवा… वाह !

गोवा की यह यात्रा शोर-शराबे से ज़्यादा स्मृतियों की शांति है। समुद्र की लहरें, माँ की यादें, पोते की ज़िद और परिवार के साथ बिताए पल—यह संस्मरण गोवा को महसूस करने की एक भावनात्मक कोशिश है।

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बेटे का इंतजार करती मां की भावुक और प्यार भरी यादें –

बाई, आज तू होती तो…

बाई की वह मुद्रा कभी अचानक नहीं होती थी. पूरा महीना इंतज़ार करने के बाद, जब मैं पुणे से अपने घर लौटता, तो माँ हमारे पहले मकान के पहले कमरे में खिड़की खोलकर बैठी होती थी. कहने को तो वह दूध लेने वाले का इंतज़ार कर रही होती थी, पर असल में उसे मेरा ही इंतज़ार होता था. जैसे ही मैं दरवाज़े से भीतर कदम रखता, वह हल्की-सी मुस्कान के साथ एक ही नज़र में मेरा पूरा एक्स-रे कर लेती.. दुबला तो नहीं हुआ, काला तो नहीं हो गयाए बाल और स़फेद हुए या डाई नहीं की. कुछ भी उससे छुपा नहीं रहता था.

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भूत समझा, माइलस्टोन निकला

एक शाम, कसारी से महिदपुर रोड जाते समय सुनसान रास्ते और अंधेरे में 13-14 साल का मैं अकेला था। सफेद परछाई देखकर डर बढ़ा, लेकिन हनुमान चालिसा के जाप ने मेरी हिम्मत जगाई। बाद में पता चला कि डरावनी परछाई असल में माइलस्टोन थी। यह यात्रा साहस, डर और विश्वास की यादगार घटना बन गई।

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कटहल! कटहल! कटहल!

कटहल सिर्फ सब्ज़ी नहीं, बचपन की मिठास है — नानाजी के घर पके कटहल का स्वाद, नानी के गोवा से लाए कटहल के तीखे पापड़, भुने हुए काजू और वो हँसी के ठहाके, जब हम सोचते थे कि हम ही हैं जो पूरा कटहल खा जाते हैं। अब सिर्फ स्वाद की यादें हैं — और हर मौसम में एक उम्मीद कि कहीं से फिर आ जाए वो पुराना कटहल…”

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