मनीषा मारु की पुस्तक ‘कुमकुम लगे पांव‘ की एक कविता

मनीषा मारु, विराटनगर, नेपाल
अगर मुड़ के देखे, जो तू मुझको एक बार,
हर रंजिशें भूलकर, मैं तो तेरी हो जाऊँ यार।
अगर मुड़ के देखे…
बेबस नैना ढूँढ़ें तुझको, हर पल पंथ निहार,
अश्कों की झड़ी ढूँढ़ती, अपना खोया प्यार।
अगर मुड़ के देखे…
तेरी आहट से ही लिपटते, दिल के सारे तार,
नशा बनकर चढ़ता, ज़ेहन में बस तेरा ख़ुमार।
अगर मुड़ के देखे…
पतझड़ से बिखरते मन में, चलती दर्द की बयार,
न देखें तेरी निगाहें, तो अधूरा-सा लगता श्रृंगार।
अगर मुड़ के देखे…
ना दे सकती गुज़रे पलों को, मैं दोषी करार,
उसी से कैद हुआ पल, बना यादों का गुलज़ार।
अगर मुड़ के देखे…
हर अक्स में गाता दिखता, तेरा चेहरा राग-मल्हार,
छूना चाहूँ तुझको तो, धूमिल हो जाता तेरा दीदार।
अगर मुड़ के देखे…
लौटकर आ जाए गुज़िश्ता पल, बनकर बाँहों का हार,
यही सोचती हर लम्हा, करती रही बस तेरा इंतज़ार।
अगर मुड़ के देखे…
गले लगा, रग़बत मेघ वर्षा, बन जा मेरा ताउम्र राज़दार,
तेरी दुआओं के इख़लास से मुतासिर हो रहा मेरा संसार।
अगर मुड़ के देखे…
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