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झारखंड में मानव–हाथी संघर्ष ने बढ़ाई चिंता

पश्चिमी सिंहभूम के गांव के पास जंगल किनारे खड़े हाथियों का झुंड और सतर्क ग्रामीण पश्चिमी सिंहभूम के गांव के पास जंगल किनारे खड़े हाथियों का झुंड और सतर्क ग्रामीण

9 दिनों में 22 मौतें

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

रांची/चाईबासा | 6 फरवरी 2026

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में जनवरी की शुरुआत में मानव–हाथी संघर्ष की घटनाओं में नौ दिनों के भीतर 22 लोगों की मौत हो गई। यह हाल के वर्षों में किसी एक सप्ताह में दर्ज सबसे बड़ी मौतों में से एक है। घटनाएं मुख्य रूप से चाईबासा और कोल्हान वन प्रमंडल क्षेत्र में हुईं।6 जनवरी की रात नोआमुंडी रेंज के बावड़िया गांव में एक हाथी ने छह लोगों को कुचल दिया। मृतकों में एक ही परिवार के चार सदस्य शामिल थे। ग्रामीणों के अनुसार, हाथी ने घर के बाहर सो रहे लोगों पर हमला किया। गांव की आबादी लगभग 2,000 है। घटना के बाद क्षेत्र में दहशत का माहौल है।9 जनवरी को मंझगांव प्रखंड के हल्दिया और बेनीसागर गांवों में हाथियों के हमले में तीन और लोगों की मौत हुई। मृतकों में 18 वर्षीय युवक भी शामिल था, जो हाथी को भगाने गए ग्रामीणों के साथ था। वन विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने और ग्रामीणों को सतर्क रहने की सलाह दी है। टॉर्च और पटाखों के माध्यम से हाथियों को दूर रखने के प्रयास किए जा रहे हैं।
मानवहाथी संघर्ष (प्रमुख आंकड़े)
हालिया घटनाएं (जनवरी 2026)
9 दिनों में 22 मौतें
6 जनवरी: एक ही गांव में 6 मौतें
सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र: पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा)
झारखंड (20202025)
कुल 525 मानव मौतें
औसत: लगभग 89 मौत प्रति माह
सिंहभूम क्षेत्र में 5 वर्षों में 101 मौतें
राष्ट्रीय परिदृश्य (20172022)
ओडिशा: 499 मौतें
झारखंड: 462 मौतें
पश्चिम बंगाल: 384 मौतें
असम: 358 मौतें
छत्तीसगढ़ (201823): 337 मौतें
हाथियों की अस्वाभाविक मौत (2009-2023)

देशभर में: 1,381
झारखंड (20182025): 100
हाथी गलियारे
देश में चिन्हित: 1
झारखंड में: 17
सारंडा वन क्षेत्र: ,200 हेक्टेयर
विशेषज्ञों का मानना है कि खनन गतिविधियों, सड़क निर्माण और वन क्षेत्र के विखंडन ने हाथियों के पारंपरिक मार्गों को प्रभावित किया है। पश्चिमी सिंहभूम और सारंडा क्षेत्र ओडिशा के सिमलीपाल टाइगर रिजर्व से जुड़े ऐतिहासिक हाथी गलियारे का हिस्सा हैं। वन विभाग ने स्वीकार किया है कि आवास विखंडन एक बड़ी चुनौती है। हाथी गलियारों की पुनः पहचान और संरक्षण की प्रक्रिया जारी है। मानव–हाथी संघर्ष की बढ़ती घटनाओं ने वन प्रबंधन, खनन नीति और ग्रामीण सुरक्षा उपायों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

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