आज का जीवन बहुत उलझा हुआ है, जहाँ सब कुछ अनिश्चित है – साँस से लेकर रिश्तों तक, ठहराव से लेकर बहाव तक। आज बहुत कुछ इतना अच्छा घटित हो रहा है जो कल के पन्नों में शायद स्वर्ण-काल के रूप में अंकित हो जाए, पर उतना ही बुरा भी घटित हो रहा है जो उसी पन्ने को कलंकित भी कर देगा।
मैं आज नई पीढ़ी की उन लड़कियों से कुछ कहना चाहती हूँ, जो अभद्र रील बनाकर सोशल मीडिया पर पागलों सा डांस या हरकतें करती रहती हैं। होटल के किसी कोने में दोस्तों के साथ बैठकर शराब और हुक्का में केवल अपना समय ही नहीं, बल्कि स्वयं का विश्वास भी खो रही हैं। पार्टियों में शराब पीकर होश खोतीं, दोस्तों का सहारा लेकर चल पड़ती हैं… कहाँ, पता ही नहीं। उनके सामने उनकी शिक्षा, उनकी नौकरी, उनके पैसे का खुला आकाश है। स्वतंत्रता है। लेकिन वे समझ नहीं पा रही हैं कि उनके पीछे की लड़कियों और महिलाओं के जीवन का वह अंधकारमय आवरण कितना कठोर था, जिसमें अनकहा दुख, परतंत्रता और घुटन छिपी थी।
जहाँ उनके स्वयं के गुण का मूल्य पहले पिता के घर के संस्कारों से जुड़ा होता था और बाद में पति के घर में पति के गुणों की छाया में खो जाता था। पर इन्हीं लड़कियों और महिलाओं ने धीरे-धीरे अपने विश्वास को थामे कदम बढ़ाकर आज का यह खुला आकाश दिया है। निःसंदेह यहाँ पुरुषों ने भी उनका साथ दिया है, तभी यह परिवर्तन संभव हुआ है। तो इसका क्या अर्थ है?
एक ऐसे बहाव का जीवन, जिसका किनारा कैसा होगा, यह पता ही नहीं।
जब मैं यह सब देखती हूँ तो मेरे सामने ओपरा विनफ्रे का जीवन घूम जाता है – जो साधारण था, ममता और प्यार से अछूता। जहाँ उनका जन्म लेना भी अपराध सा माना गया, पर उन्होंने कभी हार नहीं मानी। जीवन के रास्तों में अपनी असफलताओं और नफ़रत से कभी डरी नहीं। हर कठिन परिस्थिति का सामना किया। लड़ी अपने अधिकारों के लिए, पर जीवन को ईमानदारी से जिया। किसी को गिराकर या नफ़रत से काटकर नहीं। यही ओपरा की शक्ति थी, जिसे उन्होंने अपनी नानी के साथ बिताए छह वर्षों के अनुशासन से पाया था – नानी के साथ चर्च में बाइबल के पाठ से, नानी के प्यार और चर्च की प्रशंसा से।
अजीब जीवन था। छह वर्ष की छोटी बच्ची नानी के साथ समय बिताने के बाद अपनी माँ के पास गई, प्यार की एक आशा में, पर वहाँ उसे गहरा अंधकार मिला – जहाँ वह 14 वर्ष की उम्र में माँ बन गई। काले अध्याय का एक टुकड़ा छोटी-सी जान पर चिपक गया। यह सब इतना भयानक था कि उसका टूटना स्वाभाविक था। वह टूटी भी, बिखरी भी, भटकी भी, पर एक जगह आकर उसने स्वयं को संभाला भी। और 17 वर्ष की उम्र से ब्रॉडकास्टिंग से अपना जीवन शुरू कर एक दिन कई सम्मानों से सम्मानित होकर विश्व की एकमात्र अश्वेत महिला मिलेनियर बनीं। अपने साधारणपन से असाधारण होने का इतिहास रचा।
उनकी सोच और विश्वास हर किसी को यह समझाते हैं कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए दो बातों का हमेशा ध्यान रखें –
पहली, कभी झूठ मत बोलिए।
दूसरी, हमेशा ईमानदार रहिए।
ये दोनों गुण असफलता को सँभाल लेते हैं।
वह कहती भी हैं – “जीवन में हर एक पल भय और साहस के बीच चुनाव लेकर आता है। यह पूरी तरह से आप पर निर्भर करता है कि आप किसे चुनते हैं। मेरा मानना है कि जब हम अपने भीतर कुछ छिपाते हैं, कुछ दबाते हैं, तो वह कुंठा और नफ़रत को जन्म देता है, जो हमें गलत रास्ते पर ले जाता है।”
आज का समय भी बहुत उलझा हुआ है। इसमें पैसा, प्रसिद्धि और सुख पाने की होड़ मची है – चाहे जैसे भी हो। इसमें आज की युवा पीढ़ी सबसे ज़्यादा परेशान है। ग्लोबल चकाचौंध उसे भटका रही है, जो उसे कहाँ ले जाएगी, पता नहीं।
इसलिए सोचने की ज़रूरत केवल युवा पीढ़ी को ही नहीं, बड़ों को भी है।

रेणुका अस्थाना, प्रसिद्ध लेखिका, भिवाड़ी, राजस्थान
