एक आत्मविश्वासी युवती सूर्योदय के समय छत पर खड़ी है, उसके पास टूटा हुआ पिंजरा पड़ा है और आसमान में उड़ते पक्षी आज़ादी और सपनों की उड़ान का प्रतीक हैं।

उड़ान

‘उड़ान’ एक प्रेरणादायक हिंदी कविता है, जो लड़कियों के आत्मसम्मान, स्वतंत्र सोच और सपनों को पंख देने की बात करती है। यह कविता समाज की बंदिशों के विरुद्ध हौसले और विश्वास का संदेश देती है।

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सीधा सा गणित: बहू और ससुर के रिश्ते की भावुक हिंदी कहानी

सीधा सा गणित

‘सीधा सा गणित’ एक मार्मिक पारिवारिक कहानी है, जिसमें बहू के परिश्रम को अनदेखा कर दिया जाता है, लेकिन ससुर के स्नेहपूर्ण व्यवहार से रिश्तों की असली गरिमा सामने आती है। यह कहानी परिवार, सम्मान और प्रेम का सुंदर संदेश देती है।

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ग्रामीण आंगन में एक विरहिणी स्त्री दीपक के पास बैठी प्रेम पत्र लिखवा रही है, पास में संदेशवाहक खड़ा है और आसमान में चाँद चमक रहा है।

लिख दे कासिद लिख दे

लिख दे कासिद लिख दे इक खत’ प्रेम, विरह और समर्पण की मधुर अभिव्यक्ति है। इसमें एक विरहिणी नायिका अपने प्रियतम तक मन की व्यथा, प्रेम की स्मृतियाँ और जीवन की अधूरी अनुभूतियाँ पहुँचाने की विनती करती है।

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पेड़ की छांव में बैठी महिला स्कूल परिसर में लिख रही है, आसपास खेलते बच्चे और तितलियां हैं, जबकि पृष्ठभूमि में युद्धग्रस्त शहर की धुंधली छवि दिखाई दे रही है।

सत्य

‘सत्य’ एक गहन और विचारोत्तेजक कविता है, जो अमन के बीच युद्ध की भयावहता, बच्चों की मासूमियत और मानव सभ्यता के क्रूर यथार्थ को सामने लाती है। यह कविता शांति, संवेदना और सत्य की खोज का मार्मिक दस्तावेज है।

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रात के समय महल से जाते बुद्ध, पीछे यशोधरा गोद में राहुल को लिए दुख और धैर्य के साथ खड़ी हैं।

पुनर्जन्म

‘पुनर्जन्म’ एक विचारोत्तेजक कविता है जो बुद्ध के संन्यास और यशोधरा के मौन त्याग के बीच स्त्री जीवन के अनकहे संघर्ष को उजागर करती है। यह कविता समाज की दोहरी मानसिकता पर गहरा प्रश्न उठाती है।

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एक दिव्य दृश्य में एक ओर बाँसुरी बजाते भगवान कृष्ण और दूसरी ओर खंभे से प्रकट होते भगवान नृसिंह, प्रेम और शक्ति के दो रूप दर्शाते हुए।

मोहन से महाकालः कृष्ण और नृसिंह

“मोहन से महाकालः कृष्ण और नृसिंह” एक प्रभावशाली भक्ति कविता है, जो भगवान विष्णु के दो महान अवतारों श्रीकृष्ण और भगवान नृसिंह का सुंदर चित्रण करती है। एक ओर श्रीकृष्ण प्रेम, करुणा और गीता ज्ञान के प्रतीक हैं, तो दूसरी ओर नृसिंह अधर्म के विनाश और भक्त रक्षा के प्रतीक हैं। कविता बताती है कि ईश्वर समय और परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग रूप धारण करते हैं। यह रचना भक्ति, शक्ति और धर्म रक्षा का अद्भुत संदेश देती है, जो पाठकों के मन में श्रद्धा और उत्साह भर देती है।

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कड़ी धूप में काम करती एक भारतीय मजदूर महिला, चेहरे पर थकान और उम्मीद, पीछे पढ़ते बच्चे, दो वक्त की रोटी के संघर्ष का भावुक दृश्य।

रोटी दो जून की

अर्पणा सिंह “अर्पी” , रांची बड़ी मुश्किलों से मिल पाती है निजात,मज़दूरों को पाने में रोटी दो जून की सौगात। बैशाख की दोपहरी की धूप या बहती लू,पसीने से लथपथ हो या हो तपती भू।तन ढकने को वसन और मिटाने को भूख,इसी की आपूर्ति में रहते हैं हर पल मशगूल। बड़ी मुश्किलों से मिल पाती…

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सूर्योदय के समय निर्माण स्थल पर खड़ा एक भारतीय श्रमिक, चेहरे पर थकान और गर्व के भाव, मेहनत और संघर्ष का प्रेरक दृश्य।

हाँ, मैं श्रमिक हूँ

“हाँ मैं श्रमिक हूँ” एक प्रेरक और संवेदनशील हिंदी कविता है, जो मजदूर वर्ग के संघर्ष, परिश्रम और त्याग को उजागर करती है। कविता बताती है कि श्रमिक अपने परिवार से दूर रहकर कठिन मेहनत करता है, लेकिन फिर भी अपने काम में गर्व महसूस करता है। छुट्टियाँ, आराम और उत्सव उसके जीवन में कम होते हैं, फिर भी वह समाज की रफ्तार चलाता है। यह कविता मेहनतकश लोगों के जीवन की सच्चाई को सरल शब्दों में सामने लाती है और श्रमिकों के प्रति सम्मान जगाती है।

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बारिश के बाद बालकनी में खड़ी एक भावुक महिला आसमान में इंद्रधनुष देख रही है, यादों और अधूरे प्रेम का संवेदनशील दृश्य।

उम्र के गणित

उम्र के गणित” एक संवेदनशील हिंदी कहानी है, जो प्रेम, उम्र और सामाजिक सोच के बीच चलने वाले संघर्ष को दर्शाती है। कहानी में एक युवक अपने सच्चे प्रेम का इज़हार करता है, लेकिन उम्र के अंतर के कारण उसे स्वीकार नहीं किया जाता। समय बीतने के बाद एहसास होता है कि प्रेम उम्र का नहीं, भावनाओं और समझदारी का विषय है। संवादों और भावनात्मक घटनाओं से सजी यह कहानी पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है कि कई बार हम समाज के गणित में दिल की सच्चाई खो देते हैं।

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भीड़भरी भारतीय सिटी बस में एक कॉलेज लड़की गर्भवती मजदूर महिला को सीट पर बैठा रही है, जबकि अन्य यात्री शर्मिंदा नजर आ रहे हैं।

शर्मिंदा

“शर्मिंदा” एक मार्मिक हिंदी लघुकथा है, जो समाज की संवेदनहीनता और दिखावटी व्यवहार पर गहरा प्रहार करती है। बस में खड़ी एक गर्भवती मजदूर महिला को कोई सीट नहीं देता, लेकिन कुछ युवाओं का व्यवहार कॉलेज लड़कियों के आते ही बदल जाता है। तभी एक समझदार लड़की इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए महिला को सीट पर बैठा देती है। यह छोटी-सी घटना बड़े सामाजिक संदेश के साथ सामने आती है। कहानी बताती है कि सम्मान रूप देखकर नहीं, जरूरत देखकर देना चाहिए। यह लघुकथा पाठकों को आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है।

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